Monday, October 11, 2021

घर - भाग ५. Hindi Language _ हिंदी भाषा

घर - भाग ५
Hindi language _ हिंदी भाषा

क्षितीज पर निली बैंगनी पर्वतमाला की लहरदार लकीर निले आकाश को प्राकृतिक तोरन प्रदान कर रही थी . अचानक मोहनराव ने कार की गति कम की और धीरे धीरे एक बडे होर्डिंग्ज के पास रोक दी . डैशबोर्ड से मोबाइल उठा कर होर्डिंग की तस्वीर खिंची . ... वहां बडे बडे अक्षरों में लिखा था , ' ज्येष्ठ सहनिवास कालोनी ' !
थर्मस से गरम पानी का एक घुंट लेकर मोहनराव ने इशारें से सिंधू को बोर्ड दिखाया . सिंधू के चेहरे पर बडा सा प्रश्नचिन्ह उलझन लिए खडा था !
' कुछ नहीं... ' मोहनराव बुदबुदाएं और इग्निशन स्टार्ट किया . 
कार थरथरा कर सडक पर आई और फिर हवा से बातें करने लगी . विविध भारती पर सुरीले नग्में बज रहे थे . 
' वैसे हम कहां जा रहे है ? ' सिंधू ने हौले से पूछा . 
' पहले गांव चलते है... फिर आगे की आगे...' मनोहरराव ने मजाकिया अंदाज में कहा . 
' गांव जा रहे है तो पहले बताना था ना.... इतने दिनों बाद जा रहे है , वह भी खाली हाथ ! ' सिंधू ने नाराज होते हुए कहा . 
' ओके बाबा... रास्ते मे कही रुक जाएंगे... ठीक ...' मनोहरराव ने अपनी ही मस्ती में जवाब दिया .
तभी मोबाइल की घंटी बजने लगी . मोहनराव ने ध्यान नही दिया . सिंधू ने मोबाइल उठाया और स्पिकर चालू किया . अजय का फोन था...
' हैल्लो ऽ... ' सिंधू ने कहा .
' कहां हो मॉं आप ? बिना बताएं कहां गये हो आप लोग ?' अजय ने नाराज होते हुए पुछा . 
' गांव जा रहे है बेटा...' सिंधू ने बताया .
' क्यों तुम्हारे परमिशन की जरूरत है क्या ?' मोहनराव ने डांटते हुए बोला . 
' नही पापा.... लेकिन बताते तो अच्छा होता...' अजय ने धीरे से कहां .
' अच्छे बुरे की समझ है हमें ... तुम बेवजह चिंता ना करो..' मोहनराव ने कहा और फोन काट दिया . 
सिंधू को कल से ही अटपटा लग रहा था . पर उसका मोहनराव पर इतना भरोंसा था की वह आंख मुंद कर उनकी बातें मान लेती थी . बेपनाह मुहब्बत करते थे मोहनराव सिंधू से ! सिंधू के एक एक आंसूओं को मोतीयों से तौला था उन्होंने ! वे सिंधू को कभी भी शोक , पीडा में नही देख सकते थे . सिंधू की घर की बताई बातों से उनका दिमाग घुम गया था ..... पर वह भाव उन्होंने चेहरे पर नही दिखने दिए . सदा हल्की मुस्कान लिए खडे रहते थे सिंधू के आगे . 
रास्ते मे छोटासा शहर आया . मनोहरराव ने मार्केट लाईन में कार पार्क की और सिंधू के दुकान मे गये . सिंधू ने कुछ कपडे और भेंटवस्तूएं ली .
हायवे से दाये हाथ पे छोटी सडक पर कार मुडी . कार अब धीमी गति से चल रही थी और मनोहरराव की यादें तेज रफ्तार से ! 
घर मे पहुंचते ही बाडे मे रौनक आ गयी . पुरा कुनबा इकठ्ठा हो गया... त्योहार सा माहौल ! रसोई की खुशबू ने मोहनराव की भूख बढ़ा दी . शाम के पहले दोनों और बच्चें खेत में टहलने गये. कितने वर्षों बाद वे खेत में आए थे....
रात देर तक गपशप चलती रही . 
सुबह मनोहरराव और सिंधू ने गांव से प्रस्थान किया . 
' अब कहां ? ' सिंधू ने पुछा . 
' वापिस पुना ..' मनोहरराव ने हंसते हुए कहा .
' आप भी अजीब है.. कह रहे थे ८-१० दिन के लिए जाना है.. आपको नही लगता यह अस्वाभाविक है !' सिंधू ने मोहनराव को गौर से देखते हुए कहा . 
मनोहरराव ने कार हायवे किनारे एक बडे से पेड की छाया मे खडी की . सिंधू को बाहर आने के लिए इशारा किया . सिंधू थर्मस लेकर आई . दोनों ठंडी छांव मे बैठे... मनोहरराव ने सिंधू का हाथ अपने हाथ मे लिया...
' कुछ कहना चाहते हो..' सिंधू ने पल्लू से मनोहरराव का चेहरा पोंछते हुए कहा .
' हां... बहुत कुछ... बहू का तुम्हारे साथ अभद्र व्यवहार मुझे कतई पसंद नही आया ... तू बहुत भोली है सिंधू . रिटायर्डमेंट के बाद भी बडी रकम घर मे आई थी , लेकिन उस वक्त इतनी उथल पुथल नही मची थी . अभी खेत के पैसे आने के बाद तो भूकंप ही आया.. घर मे तणाव महसूस कर रहा हूं . तुम्हारे साथ जो हो रहा है , वह मेरे साथ भी हो रहा है.. मैने तुम्हें बताया नही बस ! बच्चों के हिसाब से अब हमारी जिंदगी समाप्त हो चुकी है . क्या हम डुबते हुए सूरज को अपना जीवन अपने मनमुताबिक जीने का हक नही है ? उम्र निकल गयी नौकरी करते करते.. तुम्हारे साथ पल भर बैठ कर दिल की बात भी नही कर सका मै... घर , रिश्तेदारी , बेटे को तुमने अकेले संभाला... कभी कोई अपनी ख्वाहिश साझा नही की हम ने... बचपन में मुझे मॉं बाप ने संभाला... विवाहोपरांत तुमने मुझे ही नही , मेरी जिम्मेदारीयों को भी संभाला . हमारे सहजीवन मे मै ने कितना साथ दिया तुम्हारा ?... कुछ भी नहीं...' मनोहरराव ने भावुक स्वर मे कहा . 
सिंधू की आंखे भी छलछला उठी .
' ऐसा नही बोलते . आपने बहुत प्यार और सुख दिया है मुझे ... मुझे आपसे ना कभी शिकायत थी , ना रहेगी ... आप सोचते बहुत है . मै तो खुशनसीब मानती हूं अपने आप को , जो आप जैसा जीवनसाथी मुझे मिला ; और हर जनम में आप ही मेरे जीवनसाथी रहोगे . ' सिंधू ने मनोहरराव के कंधे पर सर रख कर कहा . 
मनोहरराव ने सिंधू का कपाल चुमा और आंसू पोंछने लगे .... दोनों के आंसू बह रहे थे.. अविरत ! दोनों एक दुसरे को नये सिरे से खोज रहे थे... बडे प्यार से !
' चलो चलते है... लोगबाग क्या सोचेंगे हमें देख कर..' सिंधू ने संयत होते हुए कहा और उठने लगी . 
' अरे बैठो... किसी को नही पडी है हमें देखने की... बस्स हमें ही ऐसा लगता है.. पानी दो जरा . ' मनोहरराव ने कहा . 
मनोहरराव ने पानी पीया . सिंधू सडक की ओर देख रही थी . 
' एक बात बोलू सिंधू ? ' मनोहरराव ने गंभीर स्वर मे कहा . 
' हां...' सिंधू ने कहा .
' तुमने मुझे पति कम और बच्चे जैसे ही जादा संभाला है ...' मनोहरराव ने कहा . 
' आप भी योग पति कम और बच्चे जैसे ही जादा हो ...' सिंधू ने मुस्कुरा कर कहा . 
दोनों के आंसू बह कर अब माटी का सुगंध लिए मासूम हंसी बिखर रही थी फ़िजा में ...दोनों मासूम बच्चों की तरह लिपट कर बैठे थे घनी छांव मे.. अब हायवे की ट्रैफिक भी उन्हें महसूस नही हो रही थी ... खोये थे अपनी ही दुनिया मे . 
- तभी एक ट्रक की हिंदी गाने के धून की हॉर्न बजने लगी...
' गोरी तेरा गांव बडा प्यारा ऽऽऽ.......'
' चलो अभी .' सिंधू ने झेंपते हुए कहा .
दोनों कार की ओर बढ़े .....( क्रमशः )

लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

No comments:

Post a Comment