म्हरी उभयी गो तोर
Bhoyar culture _ भोयर संस्कृति
Bhoyari dialect _ भोयरी बोली
म्हरी उभयी गो तोर
डोरा घाडो आयो पूर
म्हरो घास को सपन
भयो बापा चूर - चूर ।धृ।
लाल्यो पराटी पर को
बोंड अरी को बी मार
खेत म क अगास म
रोये चंदर की कोर ।१।
संतरा क बगिच्या म
लिंबू सरखा संतर
घाम क च वलीत को
चुक्यो कहान तंतर ।२।
घेंग गयी गो सोला ला
चिमी बटाना की वर
साजवनी क दिन को
रुस्यो भाऊ मोह्यतूर ।३।
हर जलम च दादा
पासअ लागस इ घोर
कोनअ दुस्मान कन् जी
म्हरो डिठाये सिवार ।४।
कास्तकार को जलम
इठू नाम को गज्यर
सिवार म वारी वानी
म्हरो चलस बखर ।५।
संबा पाराबती म्हरा
दादा गनगोत थोर
हात पाय इ माती का
वोला पानी जसो जोर ।६।
म्हरा बोट कोम्बावस
चित हिवरो पदर
माती माय क कोरा म
पिकवूस गो भाकर ।७।
म्हरो सिक्स्यन माती को
वुभा आडवा काकर
धरतरी क वटा म
म्हरा हिवरा अक्स्यर ।८।
हमी भाव को गनित
कोनअ येडा को मंतर
चाल चालता सपे नी
मुंडो पेट को अंतर ।९।
मला ग्यान नको पाजू
तोरी चोट्टा की नजर
जोड गुना की भावना
भाग घटाव बेपार ।१०।
रचना : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर
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