* आज्ञा विशिष्ट है... एकदिश है...यह हमेशा बड़ों द्वारा छोटों को किसी काम के लिए कहना है..
* जिम्मेदारी का पटल विस्तृत है.. इस के दायरे में छोटें - बडें सभी आते है .. यह बहुदिश है..
* आज्ञाकर्ता का स्थान एक विशेष स्तर में होता है...
* जिम्मेदारी निभाने वाले हर स्तर में होते है..
* दोनों के आयाम को देखते हुए ' आज्ञा ' देना सरल दिखता है , पर यह शत प्रतिशत सच नही होता..
* आज्ञा देने का स्थान पाना यह अपनें आप में कठीण है . तथा आज्ञा का निर्माण कई कर्म संस्कार के बाद ही कर सकते हैं .
* निष्कर्ष : आज्ञा देना जितना सरल दिखता है , उसकी पार्श्वभूमी उतनी ही दुष्कर होती है .
* जिम्मेदारी निभाना हर समय ,हर स्तर पर मुश्किल होता है . यह ना सरल दिखती है ना सरल होती है . !!
* जिम्मेदारी में उचित कर्म निहित है . यह अपनें व्यक्तित्व की परीक्षा लेती है .
* जिम्मेदारी को सफलता - असफलता के मापदण्ड लगा सकते है.. इसे तौला जा सकता है ..
* आज्ञा विशिष्ट व्यक्ति देता है..
जिम्मेदारी हर किसी को निभानी होती है ( उसकी क्षमता हो या न हो..) .. इस परिप्रेक्ष्य में जिम्मेदारी निभाना ही मुश्किल लगता है..
_ लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर
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