Saturday, July 2, 2022

यादें , सवाल की - भाग २. Hindi language _ हिंदी भाषा

यादें , सवाल की - भाग २
Hindi language _ हिंदी भाषा

घर लौट रहा था अपनी ही उधेड़बुन में ! क्या करू... क्या करू ? सातवी कक्षा का अदना सा दिमाग . पहले सोचा , प्रयत्न और भाग्य की परिभाषा क्या होनी चाहिए .. प्रयत्न कर्म का वर्तमान रूप है.. उसे अनुभव किया जा सकता है , देख सकते है , नाप तौल सकते है . लेकीन भाग्य ? उसका परिमाण ?  भाग्य की भी परिभाषा बनानी होगी . भाग्य पहले भी है और बाद मे भी है . मतलब , कर्म का भूतकाल और भविष्यकाल ही भाग्य है ! मै खुश हो गया . चलो मुद्दे के आसपास तो पहुंच गया... और घर भी पहुंच गया . 
खाना खाने के बाद सोचने लगा कल की योजना के बारें में . वैसे भी मैने आखरी मे ही बोलना था . सबके बचाव बिंदू / मुद्दे ही मेरे हथियार बन सकते थे . सोचते सोचते सो गया . 
सुबह से मैने स्पर्धा के बारे में सोचना बंद कर दिया . मेरा नंबर वैसे भी शाम के पहले आने वाला था . आराम से दोपहर को स्कूल गया . हॉल खचाखच भरा हुआ था . बाहर भी बहुत भीड थी . लाऊड स्पीकर की वजह से आवाज सुनाई आ रही थी . बाहर की भीड में मै सामील हुआ . ज्यादातर विद्यार्थी प्रयत्न की ओर से बोलने वाले ही थे . मै अब थोडा परेशान हुआ . स्टेज , डायस , वक्ता , परीक्षक , अतिथि , श्रोता के दर्शन मुझे नही हो रहे थे . बेफिकिरी का आलम ऐसा की अस्मादिक ( मै खुद ) कागज लाना भूल गया . अब विरूद्ध पक्ष के मुद्दे कैसे नोट करता ? बगल में खडे दो चार लोगों से पूछा . कई ने अनसुना कर दिया . कुछ समय बाद एक ने जेब मे से दो ST Bus की टिकट निकाल कर मुझे दी . डूबते को तिनके का सहारा ! पाव बित्ता वह कागज का टुकडा... उस में भी कंडक्टर के किए पंच . छोटे छोटे अक्षरों में मैने मुद्दे नोट किए . ( वह भी केवल मै ही पढ़ सकता था ! ) खडे खडे पैर दुखने लगे . ऐसी मुसीबत पहली बार ही झेल रहा था . हृदय की धडकने तेज हो गयी थी . पसीना भी छूट रहा था . मूड की ऐसी तैसी हो रही थी . वापिस घर जाने का विचार भी कुलबुला रहा था . लेकीन संकोच वश और इज्जत ( !) की खातीर ऐसा नही कर सका . 
टिकट का पृष्ठभाग भी बारीक बारीक अक्षरों से हाऊसफुल्ल हो गया . अब दिमाग के पन्ने पर नोट करना प्रारंभ किया . सोचा , मेरा मुद्दा ही बेकार है ! पुरस्कार तो मिलने से रहा . बेइज्जती होगी वह अलग ! अब बेचैनी बढ़ने लगी . निराशा के बादल मंडराने लगे . धैर्य का बांध टूटने की कगार पर आया . हॉल मे गुॅंजती तालियों की आवाज अब मुझे चिढ़ाने लगी . सब मुझे देख कर हंस रहे है , ऐसा मुझे आभास हो रहा था .
अंत मे मेरा नाम पुकारा गया . मै भीड़ से अंदर घूसने की कोशिश करने लगा . जैसे तैसे हॉल के भीतर पहुंचा . स्टेज की तरफ बढ़ा तो अतिथियों के साथ विराजमान फालके सर मेरी ओर देख कर मुस्कुराए . मै डायस की ओर बढ़ा और माईक को एडजस्ट किया . औपचारिकता के बाद मैने प्रयत्न और भाग्य की अपनी गढ़ी हुई परिभाषा बताई . तालियों की गुॅंज से मेरी परिभाषा का स्वागत हुआ . ज्यादातर विद्यार्थियों ने भाग्य को भगवान के प्रतिरूप में प्रस्तुत किया था . मैने उन की  इस गलती का भरपूर फायदा उठाया . टिकट के पीछे लिखे मुद्दे और जितने मुझे याद आ रहे थे , उन्हे एक एक कर , रणभूमी मे खडे शत्रू की भांति बेरहमी से, अपनी तर्क की तलवार से काटता गया . आवाज में जोश और शब्दों में आव्हान अपने आप ही पैदा हुआ ! सटीक वार करता गया . दिन भर की भडास शब्दों से प्रस्फुटित हो रही थी . श्रोता में हमारे मराठी के अध्यापक भी विद्यमान थे . कर्म के आगे और पीछे भाग्य का ऐसा शब्द जाल बुना की असहमती के लिए जगह ही न बचे ! वर्तमान के प्रयत्न के बीज और भूतकाल से भविष्य काल तक फैला भाग्य का वटवृक्ष ! वेदान्त , दार्शनिकों के उद्धरण , प्रतिस्पर्धियों की गलतियां उजागर करते तर्क से माहौल ही बदल गया . मेरी अपेक्षा से ज्यादा उत्स्फूर्त प्रतिसाद मिला . अपना भाषण समाप्त कर मै स्टेज से उतरा . श्रोताओं में बैठे देशमुख सर ने मुझे पास बुलाया . गोदी में बिठा कर मेरा सर चुमा . अध्यक्षीय भाषण में मेरा ही उल्लेख बार बार आ रहा था . मेरा भाग्य आज अच्छा था लगता !!!
पुरस्कारों की घोषणा हुई . अंत से प्रारंभ हुआ ‌. मेरा नाम नदारद था . मेरा दिल बैठा जा रहा था . अब भाग्य के हिंडोले पर , कभी उपर - कभी नीचे दोलायमान मै ! दुसरे क्रमांक पर भी मेरा नाम नही था . मैने मुड कर देशमुख सर की ओर देखा . उन्होंने मेरा सिर थपथपाया . अंत मे प्रथम क्रमांक की घोषणा करने के लिए खुद अध्यक्ष महोदय ने माइक थामा . हॉल शांत था . मै उदास था . प्रथम क्रमांक की घोषणा हुई.... सुरेश....
मै देशमुख सर की गोदी से नीचे उतरा . देशमुख सर ने मुझे उठाया और स्टेज तक ले आए . मैने सभी अतिथियों के और फालके सर के पैर छूये . फालके सर ने गले लगाया . हॉल तालियों की कडकडाट से गुॅंज उठा . मेरी ऑंखें अपने आप नम हो गयी . यही तो भाग्य था... सौभाग्य था !!!!!!! 
लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर


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