Friday, July 22, 2022

निर्माण : भाग १०. Hindi language _ हिंदी भाषा

निर्माण : भाग १०
Hindi language _ हिंदी भाषा

हम दोनों की सिट्टी - पिट्टी गुम हो गयी थी . सर्द रात में भी पसीन छूट गये थे . आधे तक आये थे , आधी दूरी और तय करनी बाकी थी . स्कूटर की लालटेन जैसी हेडलाइट ! पांच फिट के आगे का कुछ भी नहीं दिखता था ... बाकी घना अंधेरा... सुनसान रास्ता ... बाघ कहॉं होगा.. किधर होगा ... अगर सामने आया तो क्या.. बगल से या पीछे से आया तो क्या ????? अनुत्तरित प्रश्नों की अनेक घंटियॉं दिमाग में  बज रही थी , लगता था उस आवाज से दिमाग ही फट जाएगा... डर का बवंडर भूतकाल , वर्तमान काल और भविष्य काल की सैर करा रहा था . उपाय का कोई रास्ता नजर नही आ रहा था . अगर हेडलाइट बंद करते है तो अनंत अंधकार में राह और हम , दोनों खोने का खतरा . हेडलाइट चालू रखते है तो बाघ महाराज को न्योता ! 
मन ही मन में भगवान से कहा , हे प्रभू आज किसी भी तरह साइट कैम्प तक पहुंचा दो . आगे से कभी रात में इस जंगल के रास्ते से नहीं आयेंगे ... बस , इस बार क्षमा कर दो......
सोचते सोचते एक मोड पर आये.. जैसे ही मुडे , कुछ दूरी पर अंधेरे में चार ऑंखें टिमटिमा रही थी . बाघ का जोडा तो नही ! सुपरवाइझर अब केवल मेरे पीठ पर बैठने का ही बाकी था , इतना पीछे से सट गया . मैने उपलब्ध साधनों में एक सुरक्षित जगह खोज ली थी.. कारगर होना , नही होना बाद की बात थी . मुसीबत आने पर हैंडिल और सीट की बीच की जगह मैने दिमाग मे फिट कर ली.. 
मैने अंधेरे में भी थोडी सी इंजिनिअरिंग लगाई . हमारा चलना जारी था , लेकीन वह चार ऑंखें वही पर रुकी थी . उन ऑंखों की उंचाई स्कूटर की हैंडिल से काफी उंची दिख रही थी.. बाघ इतना उंचा तो नही हो सकता ! अब इंजिनिअरिंग गलत थी या समय ! _ यह तो कुछ ही पल में तय होने वाला था . मै अंधेरे में ऑंखें गडाए उन्हें समझने की भरपूर चेष्टा कर रहा था.. जैसे ही हम नजदीक पहुंचे , वह चारों ऑंखें हिली.. और जंगल मे गुम हो गयी . जाते जाते जो अस्पष्ट झलक दिखी , उस से वह साम्भर जैसी लगी . साम्भर थे , इस लिए उनकी ऑंखों की उंचाई ज्यादा थी ! हम दोनों ने राहत की सांस ली . अब केवल एक चौथाई दूरी बची थी ...
राम... राम का अखण्ड जाप चालू था . धूल से पीले और पसीने से गीले हो गये थे . अब रफ्तार और बढाई . स्कूटर को खिंचते हुए हम लगभग दौड ही रहे थे . दोनों मौन थे..‌ घने अंधेरे में हमारी ऑंखें केवल कैम्प की रोशनी को ही ढुंढ रहे थे . 
मैने पसीने से भिगी शर्ट उतार ली . सुपरवाइझर को बोला की , अब तुम हैंडिल पकडो . 
' मै धक्का ही मारता हूं साहब.. आप ही हैंडिल पकडे..' सुपरवाइझर ने कहा . 
आगे रह के मुसीबत कौन मोल लेगा ? उसकी जगह वह भी ठीक ही सोच रहा था !!
दूर कैम्प की टिमटिमाती रोशनी दिखी ‌ . जान में जान आ गयी . बची खुची ताकद लगा कर हम दौडने लगे . थोडा एक्सीलेटर भी बढाया . इस भागदौड में मेरा दाया पैर जोर से फूटरेस्ट से टकराया . बस्स.. स्कूटर का , मेरा और सुपरवाइझर का ऐसा संतुलन बिगडा की नीचे स्कूटर और उस पर हम औंधे मुंह गिरे ! हमारें मुंह मिट्टी में धस गये . सुपरवाइझर झट् से उठा ... मेरे दाये पैर में दर्द की तीखी लहर दौडी . स्कूटर की पायदान ने घुटने के नीचे गहरी चोट लगाई थी . सुपरवाइझर ने स्कूटर उठाई और मेरे पास आया . मै पैर पकड कर बैठा था . उसने मेरी पैंट उपर उठाई और चोट पर कस के रुमाल बांधा . 
अब मजबूरन उसने हैंडिल पकडा . मै लंगडा कर चल रहा था . जैसे तैसे कैम्प पहुंचे . हमारी हालत देख कर स्टाफ घबरा गये . उन्होंने मेरे कपडे उतारे . गरम पानी में टॉवेल डुबा कर उस से बदन पोंछ दिया . जख्म पर बंधा रुमाल हटाया . फर्स्ट एड बॉक्स से पट्टी , मरहम , दवाईयां निकाली . चोट को बेटाडिन से साफ कर के मरहम लगाया और पट्टी बांध दी . सभी मजदूर , ठेकेदार देखने के लिए आए . 
' सब ठीक है... आप लोग आराम करो...' मैने कहा . 
खाना खा कर मैने एंटिबायोटिक टैबलेट ली...
सुपरवाइझर सब को बडी गम्भिरता से यह वाकया सुना रहा था...
मै नींद की आगोश मे समाता गया.....

लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

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