Sunday, July 24, 2022

यादें _ सवाल की ! भाग ५

यादें _ सवाल की ! 
भाग - ५

महाराष्ट्र की उपराजधानी नागपुर ..‌ घर में मराठी में बोलचाल तो घर के बाहर निकलते ही हिंदी का बोलबाला ! हर गली , हर नुक्कड , हर स्टॉप पर आटो रिक्षा की धूम ! सडक पर भी यह मुक्त पंछी की तरह विचरण करते है..‌ ना ट्रैफिक सिग्नल से लेन देन , ना यातायात नियम से कोई रिश्ता... हां , यातायात पुलिस की वक्र दृष्टी से यह आजाद पंछी कैसे बचे रहते यह यक्षप्रश्न ! शालीनता के रंगरूप से भी यह चालक अनजान होते है..  लेकीन इनकी नजर गिध्द की भांति शिकार खोजने में कुशल होती है... आपको ही पता नहीं होता है की , बर्डी जाए , महल जाए , गांधीबाग जाए या इतवारी . ( यह नागपुर के मार्केट प्लेस है .) आप सोचते रहते है तब अचानक कोई आटो रिक्षा बगल में खडे पाते है... और दनदनाता सवाल आपकी सोच साधना को भंग करता है , " कहॉं जाना है ? " 
" कहॉं जाना है ? " इस सवाल से बचने की आप ने कोई उपाय योजना की नही होती... आप हडबडा जाते है... वह इसी सवाल को दोबारा दागे , आप के मुंह से अनायास ही निकल पडता है , ' कही नही...'  तब वह ऐसी हिकारत भरी नजर से घूरता है की उसके मन के विचारों को आप स्पष्ट पढ़ सकते है ._ फिर यहॉं क्यो खडे हो ? ... आटो रिक्षा को देने के लिए पैसे नही , बस से जाएगा या मेट्रो से जाएगा कंजूस ... खालीपिली टैम बरबाद किया... पैदल चलने का शौक चर्राया है... कहॉं कहॉं से आ जाते है...‌नाट लगा दी बोहनी को... ज्यादा शायना दिखता है . .. 
मै पार्किंग में कार लगा कर , उंगली में सुदर्शनचक्र की भांति चाबी घुमाते हुए दस कदम भी नही चलता _ सनसनाता वर्षा बाण कानों में गुंजता है , ' कहॉं जाना है ? ' मै शर्म , लाचारी से भिग जाता ... दोनों हाथ जोड कर प्रणाम करते हुए बोलता हूं , ' महोदय , अभी आया हूं , कही भी जाने को काफी समय है... क्षमा करें..' वह अजीब नजर से घूरते हुए नौ दो ग्यारह होता है . मै अपना सुदर्शनचक्र जेब मे रखता हूं... मै अकेला रहा तो यह हाल है . लेकीन पत्नी साहिबा के साथ रहा तो महाभारत की जंग छिड जाती है... कार पार्किंग से लेकर वांछित दुकान में पहुंचने तक और वापसी यात्रा में ' कहॉं जाना है ? ' इस सवाल के इतने अस्त्र , शस्त्र , अग्निबाण कान , दिमाग को बिंधते है की , कौन से दुकान में जाना था और कार पार्किंग यही भूल जाते है . हम ठहरे अभिमन्यू ! चक्रव्यूह को भेद सकते है , लेकीन बाहर आने की विद्या ज्ञात नही ! 
कई बार सोचता हूं , इन लोगो के लिए कितने नाकारा है हम . इनकी हेय दृष्टि को झेलना कोई खेल मजाक थोडे ही है . 
एक दिन सोचा की , आज आटो रिक्षा से ही सफर करूंगा . मै कालोनी के मेन गेट के पास खडा हो गया . आधा घंटा हो गया , लेकीन कोई आटो रिक्षा प्रसन्न नही हुआ . बाद में एक देवता प्रसन्न हुए... आटो रिक्षा की गति कम हुई.. मुस्कुराता सवाल आया , ' कहॉं जाना है ?' मैने चेहरे पर दीनता के भाव ला कर कहा _ गांधीबाग . वह बिना मेरे तरफ देखे , जितनी गति से आया था ; उसकी दोगुनी रफ्तार से और मुझे मंझधार में छोड कर चला गया.. एक घंटा इंतजार साधना की . फल नही मिला . वापिस घर आया . गाडी निकाली और गांधीबाग पहुंचा . कार पार्क कर के सुदर्शन चक्र चलाते हुंए मै मार्केट की ओर बढा ही था की , कौरव दल का सनसनाता हुआ अमोघ शस्त्र आया , ' कहॉं जाना है ? ' ...
मै ' हत् गांडिव.....' 

लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

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