पुण्य सलिला
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इमं मे गंगे यमुने सरस्वती शुतुद्रि स्तोमं सचता परुष्णा असिक्न्या मरूदूधे वितस्तयार्जीकीये श्रृणुह्या सुषोमयां ।
_ ऋग्वेद : नदी सुक्त
नदी दौडती.. उछलती पहाडों से नीचे , कुदते - फांदते सीधी खडी ढ़लानों से बेपरवाह अल्हड किशोरी की तरह ! उस के कलकल की खिलखिलाहट मुग्ध कर देती है अनायास ही.... तीर्थ की घंटियों का निनाद गुंजते रहता उस की नुपूर जैसा . वह सकुचाती और फिर बढ़ जाती आगे अठखेलियां करते हुए .
- अचानक ठिठक जाती है वह तराई को देख कर .... सोनजुही ठीकठाक करती अपने आप को और रखती है एक एक कदम बडी नजाकत से .... कौतुहल से निहारती है चारों ओर आवेग को लगाम लगा कर . आदत नही थी उस को ऐसा चलने की . उछल - कुद करती तरंगिनी थोडी समझदार हो जाती है . मंजीर अब धीमे धीमे बजती है... शायद वजन भी कुछ बढ़ गया है .
देखते देखते मैदानी प्रदेश मे पहुंच जाती है मुग्धा ! कुछ सहेलियां भी आकर बतियाती है उस से ... साथ चलते चलते एकाकार हो जाती है एक दुसरे में .... स्थूलता बढ़ती जाती अपने आप .... हौले हौले मार्गक्रमण करती जाती गजगामिनी सरिता . चारु चंद्र की सोलह कलाओं से युक्त वह .
विस्तृत घाट और लोगों की भीड की अभ्यस्त हो चुकी प्रवाहिनी . यह सब देख , मातृत्व की अनुभूति होती है तरिणी को....
- अचानक अलग ही हुंकार सुनाई देती है उसे ... गाद में धंसते जाते पैर ... झल्लाहट से बिखर जाती है उस की धाराएं.. बनाते जाती पानी का जाल ...
ठिठक जाती वह...सहम जाती वह... अर्णव की विशालता देख कर .कसमसाती वह समा जाती रत्नाकर मे... असहाय - सी.....
कविकल्पना की लहरें देख नही पाती उस के आंसू !
लेकीन एक अपवाद नदीतमा का ! अपने अस्तित्व को दांव पर लगा कर तिरोहित हो गयी धरती मॉं के आंचल मे...
वेदवती का कर्म और धर्म भी निराला पावन..
वेद स्मृति की महिमा मनभावन...
हरहवती... मॉं सरस्वती... मधुर जल सरी उदकवती
न क्षार न क्षरण , पुण्यसलिला हे अन्नवती....
लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर
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