Wednesday, June 8, 2022

ताप ( हिंदी कविता )

ताप
Hindi language _ हिंदी भाषा

रोज सिमटता रहा
कैसे अपने आप में
पहले मिटता रहा
विवेकी अनुताप में ।

तब उलझ रहा था
तकलीफ के खाप में
अब झुलस रहा हूं
गणतंत्र के ताप में ।

आम हरदम आम
सत्ता के अनुपात में
सपने बेदम खास
हर गिरते पात में ।

कभी तो शीतल चांद
सुधा पिलाये ताप में
कभी तो विकल मांद
हमें सुलाये नाप में ।

लुप्त सत्य की रोशनी
हरिश्चंद्र के शाप में
अश्वत्थामा पीछे शनि
गर्भनाश के पाप मे ।

रचना : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

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