ताप
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रोज सिमटता रहा
कैसे अपने आप में
पहले मिटता रहा
विवेकी अनुताप में ।
तब उलझ रहा था
तकलीफ के खाप में
अब झुलस रहा हूं
गणतंत्र के ताप में ।
आम हरदम आम
सत्ता के अनुपात में
सपने बेदम खास
हर गिरते पात में ।
कभी तो शीतल चांद
सुधा पिलाये ताप में
कभी तो विकल मांद
हमें सुलाये नाप में ।
लुप्त सत्य की रोशनी
हरिश्चंद्र के शाप में
अश्वत्थामा पीछे शनि
गर्भनाश के पाप मे ।
रचना : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर
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