डायरी - २०२२
लिफ्ट : भाग ४
मै वैसे भी लिफ्ट देने के पक्ष में नहीं रहता हूं . मुझे अपनी ही धून में गाडी चलाना भांता है . न बातचीत.. न रोकटोक !
आखिरकार दाये हाथ पर तीसरा स्कूल भी आया . मैने राइट इंडिकेटर देकर बाइक स्कूल के गेट के पास रोक दी . इस सडक पर यह आखिरी स्कूल था .
' उतरो..' मैने कहा .
' नही , यहॉं नही उतरना है.. और आगे जाना हैं.. please .' लडकी ने कहा .
' अरे आगे का कोई नाम तो होगा ? देखो , अभी तुम परेशान कर रही हो...' मैने कहा .
' थोडा आगे जाना है....' लडकी ने कहा .
अब किसी अनजान भय से डरने की मेरी बारी थी . मुझे लडकी का रवैया भी ठीकठाक नही लग रहा था . मेरा विचारचक्र तेजी से घुमने लगा . आगे चौराहें पर १० - २० पुलिस का डेरा रहता था . चौराहे से आगे १ कि.मी. सडक सुनसान जगह से गुजरती थी . क्यो की यह जगह तालाब और जंगल के किनारे है . अगर इस लडकी ने चौराहे पर कोई हंगामा किया तो , मेरा पुलिस के चंगुल में फसना तय था .
मैने तेजी से बाइक निकाली.. किसी भी हालत में मुझे वह पुलिसवाला चौराहा पार करना था .
' देखो , तुम्हें कहॉं जाना है , यह तुम बता नही रही हो . मुझे साइट पर पहुंचना जरूरी है . अभी भी समय है ... सही सही बताओ , तुम्हें कहॉं जाना है ? ' मैने सख्त अंदाज में कहा .
' चौराहे से लेफ्ट जाना है..' लडकी ने कहा .
' मुझे सीधा जाना है..' मैने तेजी से चौराहा पार करते हुए कहा .
फिर आगे जा कर सुरक्षित जगह पर बाइक रोक दी .
' अभी तुम उतरो...' मैने सख्ती से कहा .
' नही , मुझे चौराहे से लेफ्ट जाना था...' उसने गिडगिडाते हुए कहा .
' मुझे सीधा जाना है . मै तुम्हारे इशारों पर नही चलूंगा . और अब भी तुम्हे कहॉं जाना है , यह नही बताया.. पहले तुम नीचे उतरो . ' मैने गुस्से से कहा .
' नही , मै यहॉं नही उतरुंगी.. मुझे जहॉं से लिफ्ट दी थी , वहॉं वापिस छोड दो . ' उसने कहा .
' इतना समय नही है मेरे पास... उतरो नीचे .' मैने उसका बैग खिंच कर उसे उतारते हुए कहा .
मै उस से जल्द ही छुटकारा पाना चाहता था . थोडा डरा हुआ भी था .
' आपका नंबर तो दे दो...' उसने कहा .
' मेरे पास कोई नंबर वंबर नही है..' मैने बाइक पर बैठते हुए कहा .
उसने पिछली सीट को कस कर पकड लिया . मैने बाइक रेस की..उसका हाथ छुट गया . मैने बिना पीछे देखे तेजी से बाइक दौडाई . साइट पर पहुंचा तो मै पसीने से तरबतर हो गया था . ऑफिस मे सुपरवाइझर और ठेकेदार बैठे थे . मैने बाइक स्टैंड पर लगाई और ऑफिस मे गया .
' क्या हुआ साहब ? ' सुपरवाइझर ने मेरा हाल देख कर पूछा .
मैने सारी हकीकत बयान की . सुपरवाइझर ने पानी लाया .
' लेकीन साहब , आज तो रविवार है... आज कौन सा स्कूल रहता है ! ' एक ठेकेदार ने कहा .
' अरे हां.. यह बात मेरे दिमाग मे ही नही आई ....' मैने कहा .
और सभी मेरी ओर अचरज से देखते हुए मुस्कुराने लगे ....( समाप्त )
लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर
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