पिताजी
हम छोटे थे , पिताजी तो धुरी थे
भाग्य रेखाएं भी थी समसमान
चहकते भी थे , सहमते भी थे
बगिया को सींचते थे बाग़बान ।१।
रुठी तकदीर टूटा आसमान
लाख मिन्नतें विफल भगवान
पिता का पावन साया हट गया
तकलीफ मे घरौंदा परेशान ।२।
बडा बना कर छीना बचपन
हुआ असीम हमारा नुकसान
बोझ असहनीय नन्हें कंधों पे
दया नही आई हे कृपानिधान ।३।
डूब गया मॉं के माथे का सूरज
गली कलाईयों की हुई वीरान
हर कोनें में महसूस करती
बिखरी यादों के अमीट निशान ।४।
सदा हृदय से हमें लगा कर
आंसुओं से कराती सचैल स्नान
दुनिया ही उजड गयी हमारी
छीन ली घर की आन - बान - शान ।५।
रचना : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर
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