Monday, March 7, 2022

नान्हो - सो गाव ( भोयरी कविता ). bhoyar culture _ भोयर संस्कृति. bhoyari dialect _ भोयरी बोली

नान्हो - सो गाव 
( भोयरी कविता ) 
Bhoyar culture _ भोयर संस्कृति
Bhoyari dialect _ भोयरी बोली

स दूर घाटि क मंझार
ठाठरतो येक नान्हो - सो गाव 
मुखडो बदलाय कन् बाहाड्यो
फयलावत गयो आपरो पाव ।

स दूर घाटि क मंझार
ठाठरतो येक नान्हो - सो गाव
दसरो - दिवारी चहल पहल
लगनसराई म मोठी धांदल
बाहिर गया पोटुबाटूना म च
ढुंढस आपरअ माती को भाव ।

स दूर घाटि क मंझार
ठाठरतो येक नान्हो - सो गाव
अकाल , तकलीफ को हर साल
बिजली - पानी को बेगरो च ताल
तंगी की फुन्सी , करजा को खांडुक
हास कन् लुकावस पिक्यो घाव ।

स दूर घाटि क मंझार
ठाठरतो येक नान्हो - सो गाव

चितरंग सरखो घाडो साजरो
वोला नहाय रोवन को मावरो
सेव - पदर , फेटा - टोपी को मान
रीतिरिवाज को साजरो लगाव ।

स दूर घाटि क मंझार 
ठाठरतो येक नान्हो - सो गाव
उपी सिमिट कन् माती की धडी
खसी आजा वानी रुवाब की गढी
ढोर - बासरू को गोहन बी सप्यो
आबअ कावरा करस काव काव । 

स दूर घाटि क मंझार
ठाठरतो येक नान्हो - सो गाव
वीर मारोती , माता माय को ठानो
गाव सिवार  भोल्यानाथ को गानो
सप्तो , दही लाही , भजन - किर्तन
मन रमावन ला देव को नाव ।

स दूर घाटि क मंझार
ठाठरतो येक नान्हो - सो गाव........

रचना : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

2 comments:

  1. हमरो गांव तुमरी कविता को अनुसार है। खूब साजरो लिख्यो है अभिनंदन जी

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    1. धन्यवाद नन्दलाल जी 🙏🙏
      योगायोग..😊

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