नान्हो - सो गाव
( भोयरी कविता )
Bhoyar culture _ भोयर संस्कृति
Bhoyari dialect _ भोयरी बोली
स दूर घाटि क मंझार
ठाठरतो येक नान्हो - सो गाव
मुखडो बदलाय कन् बाहाड्यो
फयलावत गयो आपरो पाव ।
स दूर घाटि क मंझार
ठाठरतो येक नान्हो - सो गाव
दसरो - दिवारी चहल पहल
लगनसराई म मोठी धांदल
बाहिर गया पोटुबाटूना म च
ढुंढस आपरअ माती को भाव ।
स दूर घाटि क मंझार
ठाठरतो येक नान्हो - सो गाव
अकाल , तकलीफ को हर साल
बिजली - पानी को बेगरो च ताल
तंगी की फुन्सी , करजा को खांडुक
हास कन् लुकावस पिक्यो घाव ।
स दूर घाटि क मंझार
ठाठरतो येक नान्हो - सो गाव
चितरंग सरखो घाडो साजरो
वोला नहाय रोवन को मावरो
सेव - पदर , फेटा - टोपी को मान
रीतिरिवाज को साजरो लगाव ।
स दूर घाटि क मंझार
ठाठरतो येक नान्हो - सो गाव
उपी सिमिट कन् माती की धडी
खसी आजा वानी रुवाब की गढी
ढोर - बासरू को गोहन बी सप्यो
आबअ कावरा करस काव काव ।
स दूर घाटि क मंझार
ठाठरतो येक नान्हो - सो गाव
वीर मारोती , माता माय को ठानो
गाव सिवार भोल्यानाथ को गानो
सप्तो , दही लाही , भजन - किर्तन
मन रमावन ला देव को नाव ।
स दूर घाटि क मंझार
ठाठरतो येक नान्हो - सो गाव........
रचना : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर
हमरो गांव तुमरी कविता को अनुसार है। खूब साजरो लिख्यो है अभिनंदन जी
ReplyDeleteधन्यवाद नन्दलाल जी 🙏🙏
Deleteयोगायोग..😊