भोयरी संस्कृति - २५ : होरी सिमगा - धुड्डी
Bhoyar people _ bhoyari culture
भोयर लोग _ भोयरी बोली
अहकूटा भयत्रस्ते: कृता त्वं होली बालिशै:
अतस्वां पूजयिष्यामि भूति - भूति प्रदायिनीम् ।
language of the article : bhoyari dialect
भोयरी संस्कृति मऽ होरी बसंत रुत म को मोठो तिवार.. मोठो पर्व ! फाग पुनव ला होरी आवस आन् दुसरऽ दिन धुड्डी खेलस . धुड्डी बसंत रुत क उत्सव को पह्यलो दिन . उत्तर भारत मऽ धुड्डी पासिन नवो साल लागस त् महाराष्ट्र म यासिन १५ दिन बाद नवो साल लागस .( गुढीपाडवो ) .
* होरी भारत , नेपाल , पाकिस्तान , बंगलादेस , सिरीलंका , मारीसस , फिजी आन् क्यारेबियन देस म धुमधाम कन् मनावस .
* होरी का नाव : डोल यातरा / डोल पुर्णिमा ( प. बंगाल )
कामन पोडिगयी ( तमिलनाडू )
होला मोहल्ला ( पंजाब )
कामना हब्बा ( कर्नाटक )
फगुआ ( बिहार )
होळी , हुताशनी पौर्णिमा , नारळी पौर्णिमा ( महाराष्ट्र )
शिमगो ( गोवा )
गोविंदा होली ( गुजरात )
योसांग होली ( मणिपूर )
छारंडी ( राजस्थान )
फाग , फाग पुनव .....
१. मान्यता : * पुरान कऽ अनुसार हिरन्यकसिपू की बहिन को नाव होलिका होतो . वा रोज आग कन् न्हावत होती . हिरन्यकसिपू ला भगवान बिस्नु देव को भगत , परलाद नाव को पोरग्यो होतो . राजो बिस्नुदेव ला दुसमन मानत होतो , तेकन वोनऽ परलाद ला मारन को बिचार कऱ्यो . वोनऽ आपलऽ बहिन होलिका ला कह्ये क् परलाद ला मांडीपर बसाडकन् अंगार कन् आंग धो . होलिका न उसोच कऱ्यो ; पर होलिका जर गयी न् परलाद बाच्यो . कारन होलिका भूल गयीती क अगनी नहान वा येकलीच कर सकत होती . तब पासिन येनऽ तिवार की परथा पडी .
* होरी तिवार ला पुरानऽ बसंत उत्सव को रूपांतरन बी मानस .
* खूब पुरानऽ जमाना मऽ होरी ला ' होलाका ' कव्हत होता .
* लिंगपुरान म फाग पुनव ला ' फाल्गुनिका ' कहेस .
* वराह पुरान मऽ येला ' पटवास - विलासिनी ' कहेस .
* येक पुरान कथा क अनुसार राजा रघु जवर लोगना गया आन् सांगे क ' ढोण्डा / धुंधी ' नाव की राकस्यसीन ला सिवजी को वरदान भेटेस क वा कुनीकन् मरनार नही , सिरफ खेलता - मस्ती करता पोटुबाटूना ला च वा भेयेन आन् ' अडाडा ' मंतरकन् भागेन .
* कयी लोगना क माननो स क होरा स्यबद नवऽ साल सिन संबंधित स . जूनऽ साल क आखरी म साल बदलवनी वालो तिवार , बसंत रुत - नवो साल आवन क रूप म रंग खेलन को तिवार असो पह्यले रूप होतो , असा मानस .
* असी मान्यता सऽ कऽ भगवान सिवजी न होरी क दिन कामदेव ला भसम करेतो .
* नारद पुरान आन् भविस्य पुरान मऽ बी होलाका पर्व की जानकारी स .
२ . होरी तिवार को बदलतो रूप : * सुरवात क बेरा म होरी तिवार सवासिन बाईलोगना घर परिवार क सुख समरुध्दी साठी फाग पुनव क चांद की पूंजा करकन् मनावत होता .
* वैदिक काल म होरी ला ' नवात्रेष्टि यज्ञ ' कवत होता . वोन बेरा खेत मिसिन निकऱ्या अनाज ला होम म दान करकन् भूंज्या अनाज को परसाद लेनको रिवाज होतो .अन्न ला होला बी कव्हस , तेकन येनऽ तिवार ला ' होला , होलिकोत्सव ' नाव पड्ये . भुंज्या सोला ला बी हुरा , होरा , होला कव्हस .
* वेद काल क बाद म होरी क दिन गार ( गाली ) देन को रिवाज पडे . आन् होरी दहन ला मृत संवत्सर को प्रतिक माने तेकन होरी जवर बाईलोगना को जानो बंद भये .
* आब गार ( गाली ) देन को रिवाज बंद पडेस . माय बाप संगं पोटुबाटूना सबन होरी की पूंजा करन ला जास .
* बरसाना की लठमार होरी परसिध्द स .
३. होरी : भोयरी संस्कृति मऽ बसंत पंचमी पासिनच होरी को माहोल चालू होस . गोबर की चाकोली ( गूलेरी , बडगुले , भरभोलिये ) बनावनो चालू होस . इ चाकोलीना बेग - बेगरऽ आकार की रव्हस आन् मंझार म वोला मुंज क रस्सी म गुफन साठी सेदूर करस . होरी साठी खोडना जमा करनो चालू होस . मयदान मऽ जागा झाडकन् पानी सिपडस . मंझार म दर करकन् वोम मोठो खोड आन् अरंडी को झाड गाडस . वकऽ भवताल खोड , काडी , तुराटी रचस आन् सूत गुंडारस . कयी जागा पर होरा आन् होरी असी दुय बनावस . भवताल चऊक पुरस . महुरत क बेरा पर सबन आपापली पूंजा लेकन होरी जवर जमा होस . पूंजा म चाकोली आन् गाठी की मार , बत्तासा , नारेल , दिवो , हरद कुकू , कपूर , उदबत्ती , गुलाल न् पुरन को निवद रव्हस . पह्यलऽ जमाना मऽ होरी जवर कोतवाल रव्हत होतो , तेकन पुरन का दुय निवद लिजात होता ; येक कोतवाल साठी न् येक होरी साठी . होरी क भवताल पानी फिरायकन् होरी ला चाकोली आन् गाठी की मार चढावस . पूंजापाती करकन् निवद धरस आन् येकदुसरा ला गुलाल लगायकन् नमस्कार करस .
४ . धुड्डी : होरी क दुसरऽ दिन रंग खेलस . परसा क फुल को रंग बनावस . दुकान मीन बी रंग ल्यावस . धुड्डी ला धुरड्डी , धुरखेल , धुलिवंदन , धुळवड , धुलेंडी बी कोस . होरी म जरी चाकोली की राखड घर म ल्यावस . होरी पर आंग धोन साठी पानी गरम करस . येटार येटार म रंग खेलन साठी येक दुसरा क घर जास . नानऽ पोटुना ला गाठी मार घालस . बसंत , रंग की मऊज मस्ती म सबन रंग जास .
होरी खेलू आज किसनजी
तोरऽ संग खेलू खूब होरी ।
महाल मऽ तोला पकडू
सबन संगऽ तोला रंगावू
कसर सगरी मु निकारु
तू केतरी ले खबरदारी ।
लुक कन् आमाला रंगाये
राधा ला तू गुलाल लगाये
तोरा सोबती मला चिडाये
आब आई काना तोरी बारी ।
( सहयोग : सौ . पार्वतीबाई महादेवराव देशमुख )
लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर
👌👍 भोयरी परंपरा , संस्कृती की खुब साजरी माहिती
ReplyDeleteधन्यवाद मनोज जी
Delete👌👍 भोयरी परंपरा , संस्कृती की खुब साजरी माहिती
ReplyDeleteधन्यवाद गोरे जी
Deleteअपनी बोली म होली को त्यौहार की खूब साजरी जानकारी।
ReplyDeleteहोली बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है।
अच्छा लिखा है