भोयरी संस्कृति - ३८ : गोंदन
Bhoyar culture _ भोयर संस्कृति
Bhoyari dialect _ भोयरी बोली
गोंदन ला गुदनो , गोदनो , ट्याटू , पछेना , अंकन असऽ नाव कन् बी वोरखस . आंग पर ( हात , बोट , मनगट , पाय , गरदन , दंड , पाठ , मुंडो ) चितरंग , चिन्ह , आकरूती काढन साठी चमडी प टोच कन् रंगवन की कला ला गोंदन कोस .
गोंदन को चलन : गोंदन कला धारमिक जीवन , संस्कृति , कुल , रिवाज , परंपरा , सामाजिक मोल , मान्यता , फ्यासन असी कयी रूप म दिसस . गोंदन ला सिंगार , साजरपन , प्रेम , स्यील , बहादुरी को प्रतिक , हिंद्यान साठी बी काढस .
जेनऽ काल म कला आन् कलाकार या संकल्पना च नी होती , वोनऽ जमाना पासिन आदिवासी लोगना न कला आन् साजरपन को साजरी बानगी गोंदन कला क रूप म दुनिया ला देयीस .
इतिहास : * वेद म गोंदन को उल्लेख नहाय . या आदिवासी कला बाद मऽ हिंदू संस्कृती म आयी .
* ५३०० बरस पुरानऽ ' ओत्सी द आईस मॅन ' येनऽ आदिमानव क आंग पर ५७ गोंदन का चिन्ह सापड्यास . मिसर ( इजिप्त ) क ममी क आंग पर बी गोंदन दिख्येस .
* बायबल , कुरान न गोंदन ला वरजिक मानेस . हिंदू संस्कृती न आदिवासी क गोंदन कला ला रिवाज म डाये .
* छत्तिसगढ म रामनामी समाज आंगभर रामनाम गोंदस . या परंपरा १०० बरस पासिन स .
* गोंदन की चाल भेव आन् सरधा पासिन पडी . भूतखेत , बिचुकाटा - जनावर , देवता क नाराजी पासिन गोंदन रखवाली करस , या भावना होती . बाद मऽ कुर कबिला का चिन्ह आया . वोकऽ बाद सिंगार , हिंद्यान साठी गोंदनो आयो . आब त फ्यासन स ! आब ट्याटू ( tattoo ) काढकन् # inked असो ट्याग बापरकन् Instagram पर डावस !
* कपडा पेहरन ला सुरवात होन क पह्यले पासिन गोंदन ला सुरवात भयी .
मान्यता : * आदिवासी गह्यना परस गोंदन ला महत्व देस .
* आंग पर गोंदे रह्ये त सर्ग म जागा भेटस , असी मान्यता स .
* आदिवासी आपलऽ कुर को चिन्ह गोंदस . गोंदन को चिन्ह देख्या बास्त देखनी वाला ला आपरंग च वोकी जात , कबिला की जानकारी होस .
* गोंदन क बेरा पोरग्यो गोंदन को दुख , अगिन सह्यन नी करत होयेन , त वू पोरग्यो लढाई क काम म नी आयेन . आन् पोटी ला गोंदन की तकलिफ सह्यन नी होत होयेन त वोला बारतपन म तकलिफ जायेन , असी मान्यता स .
_ भारत म गोंदन क रंग साठी बाई को दूध / कारला को रस , खान को तेल , काजर , बिवला झाड को रंग असा कयी परकार का रंग बापरस . चमडी का सात थर रव्हस . वोमऽ क वरतऽ क तीन थर गोंदन को रंग जास . कारो , निरो , हिवरो , लाल रंग गोंदन म जास्त दिसस .
पह्यले आदिवासी बाईलोग ना गोंदन को काम करत होती . आब गोंदन करनी वाला लय कलाकार भेटस . पुरानऽ जमाना मऽ गोंदन क बेरा पोटी बाटीना रोवत होती . तब गोंदनी वाली आदिवासी बाईलोगना वून ला समजावन साठी गाना गावत होती .
भोयरी संस्कृति मऽ बाईलोग , पोटीना थोडोबूत गोंदस .
* जलमभर सवासिन रह्या पायजेन येक साठी माथा पर कुकू क जागा पर नानोसो टिक्को गोंदस .
* जेवनऽ हात क मनगट पर तरहात कितऽ भाऊबीज गोंदस . येक चंदर कोर आन् वरतऽ खलतऽ येकेक बिंदी असो भाऊबीज को चिन्ह रव्हस .
* जेवन हात क अंदर वाली जागा ( मनगट पासिन ढोपर पावतर ) प भावली ( बाहुली ) गोंदस . मंझार म येकच मुंडो आन् दुय आंगऽ चिन्ह रव्हस .
* डाखऽ हात क अंदर वाली जागा ( मनगट पासिन ढोपर पावतर ) प सीता नहानी गोंदस . मंझार म गोल भिर आन् चारी बाजू पायरी की डिझाईन असो भूमिती सरखो चिन्ह रव्हस .
* डाखऽ हाथ क पंजा पर आंगठा कितऽ बिचू , चिल्हंगठी कितऽ चार नानी रेघना ( जेला गहू कोस ) आनं मंझार म फुल क डिझाईन वाली भिर गोंदस . मंझार की बिंदी ठोकर आन् वोकऽ भवताल साहा बिंदीना , असी भिर की डिझाईन रव्हस .
* गोंदन क बेरा दुखसच . अगिन होस . गोंद्या बाद वोपर येरंडी को तेल आन् हरद को लेप लगावस .
_ असी गोंदन की अदभूत कारागीरी आन् बदलतऽ जमाना संग वोको बदलतो रूप रंग !
# येक छत्तिसगढी लोकगीत ----
तोर नाव के गोंदणा गोंदाएव ,
मारे मया के चिन्हारी बर ,
अब्बडमया तोला करभव ,
मया पिरत के फुलबारी बर ,
गोंदाफुल करू हमर मया ,
फुलत रहय मया के बगिया मऽ .
# लागं वतरा खणाई पणन कमी कोनी धणाई (खूब गोंदाये पर बाटी नी )
# तोर नाव को गोंदन , डाखऽ हाथ प मिरवून .
# नांद कन् आयी पर गोंद कन् नी आयी .
लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर
बहुत ही बढ़िया लिखा है गोंदन कला पर
ReplyDeleteधन्यवाद सर
Deleteखुब साजरी माहिती
ReplyDeleteधन्यवाद मनोज जी
ReplyDeleteखूब साजरी माहिती.
ReplyDeleteधन्यवाद सर
Deleteआपण खूपच सुंदर माहिती देत आहात ,आपले आभार. भोयर ,पवार समाजातील प्रथा ,परंपरा जपण्यास व सांस्कृतिक ठेवा जतन करण्यास आपल्या भोयरी भाषेतील साहित्याचे अमूल्य योगदान आहे .
ReplyDeleteसुधीर भोयर ,वर्धा
धन्यवाद सर
Deleteमहत्व पुर्ण माहीती ।।
ReplyDeleteधन्यवाद सर
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