*चहुंओर कृष्ण , मैं बिना चावल लिये सुदामा*
*शिक्षा के लिये गांव के बाहर कदम रखते ही कारंजा के सखा मिला लेते है मुझ सुदामा को ' सांदीपनि ' गुरूकुल के समूह में*
*मैं रिक्त हाथ!... बटोर लेता हूं कुछ छांव के टुकड़े... कुछ धुप के अहसास , कुछ सृजन की बूंदें...*
जब मैं पीछे मुडकर देखता हूं , तब जीवन में आये ; मानवीयता की परिभाषा बनकर -- रिश्तें- नातों की सुखद अनुभुति देने वाले व्यक्तित्व मेरे मानसपटल पर चित्र की भांति कोलाज बन कर उभर आते हैं। मेरे जनक , सहोदरों के लिये मैं सुदामा न रहकर ' कान्हा ' रूप रहता हूं। लेकिन जैसे ही दहलीज से पैर बाहर रखता हूं...समाज आंगन में ; मुश्किलें घेर लेती हैं... मैं हतप्रभ ; महाभारत के चक्रव्युह में फंसे अभिमन्यु की तरह ! ... तभी कानों में गुंजती है पांचजन्य की ध्वनि... कृष्ण आते हैं मुस्कुराते हुये... छंट जाती है धुंध..... सांसें भी नियंत्रित हो जाती हैं । मेरा ' कर्म' बताकर कृष्ण बजाते है जगतमोहिनी बांसुरी... मैं खो जाता हूं... समाहित हो जाता उस सूरसरिता में... कितनी आसान हो जाती है जिंदगी... मै एकांत में सोचता रहता हूं उन कृष्ण के बारे में -- जो कभी दिग्दर्शक , सखा , तीर्थस्वरूप अवतरित हो , मंगलमय कर जाते इस जीवन को.. गले लगाते मेरे जैसे सुदामा को बिना चावल लिये !
शिक्षा के लिये गांव के बाहर कदम रखते ही कारंजा के सखा राजेश काळबांडे , विजय मस्की , दिनेश महल्ले , भारती भांडवलकर मिला लेते है मुझ सुदामा को ' सांदीपनि ' गुरूकुल के समूह में.
इंजिनियरिंग कॉलेज में प्रवेश के पहले दिन ही वहां के अकाउंटेंट मेरी ३५० रुपये की फीस खुद भरकर बन आते हैं कृष्ण ; मै चकित... व्यवहारिक ज्ञान से अपरिचित.। वहीं और गोप आते हैं जीवन में ; राजू बेले , सुनील बोकडे , महेंद्र सोनटक्के , संजय धोटे... मै गुम हो जाता हूं इस कोलाहल में.. राजू बेले वापिस ढूंढता है ; बांध दोस्ती की अनंत डोर !
स्थापत्य अभियांत्रिकी का प्रात्यक्षिक अनुभव करता हूं। मनोजकुमार अग्रवाल जी के संग.. उन्हीं के फर्म में । वे कृष्ण बनकर बताते हैैं व्यवसाय और व्यवहार। गीता.व्यवसाय के कुरुक्षेत्र में सखा तो साथ है ; और एक जगह इंजि. दिलीप तिळगुळे बंधाते हैं ढांढस इस रण में कृष्ण बनकर।
बालसखा श्रावण फरकाड़े दिल में बोते हैं बीज समाज सेवा के। तभी इंजि. मुरलीधर टेंभरे बढ़ाते हैं साहस ; घर से लेकर व्यवसाय तक तत्पर मदद लिये कृष्ण की भांति। स्व. कन्हैयालाल बोवाडे जी का सुदर्शनचक्र बढाता गया दायरा सेवा का।अग्रज वल्लभ जी डोंगरे का स्नेह उतरता गया मनमस्तिष्क और लेखणी में भी जन्मजन्मांतर से द्वैपायन की तरह। ' बलराम ' डहारे , ' बलवंत ' कडवेकर जी नाम के अनुरूप ही साफ करते गये मुसीबतों के बादल. ' युवा मंच ' के सखा , सखी , हितचिंतक बढ़ाते गये सुदामा का कारवाॅं। धार- मांडू दर्शन यात्रा में जगह जगह के संगठन और पदाधिकारी यजमान बनकर आगे आये इस गोकुल के।
रविंद्र दादा डोंगरदेव साहित्यिक हलचल के ऊर्जावान प्रगाढ सखा। अवशेष को शेष बनाने वाले भागीरथ डॉ ज्ञानेश्वर टेंभरेजी ने उंगली पकड़कर चलाया ; योगेश्वर बनकर. सखा का। रा. चव्हाण ने लेखनी को निर्देशित किया वऱ्हाडी की ओर तो अंजली कारंजकर मॅडम ने लेखनी को दिया पूरा फलक. शुभदा फडणवीस मॅडम, सुनीती देव मॅडम , संजीवनी पावडे मॅडम का सरल स्नेह .. आशिष पाकर धन्य हुआ.
उज्जैन से एक धागा मंगाने पर हनुमान की भांति द्रोणागिरि... मतलब धागों का बंडल ही लाने वाले सखा युवराज जी हिंगवे. रामलाल जी देशमुख का दुलार तो नामदेवराव जी बारंगे की आत्मियता. नामदेवराव बोबडे , रामेश्वर गोरे आत्मीय सखा। सरिता बोबड़े और विजय बोबड़े दम्पत्ति का स्नेह। मदद के लिये तत्पर युवा सखा नंदलाल बारंगे , अतुल राऊत, राजेश बारंगे , नीरज पवार , डॉ. उदय चौधरी, अजय डहारे , योगेश झाड़े, नितिन नायगांवकर, मनोज गोरे, संजय ढोले .....
मस्तमौला सखा विद्यानंद हुलके, देवेंद्र चौधरी, जगदीश्चंद्र पवार, सुभाष तुलसीता , सु.पु. अढाऊकर...
स्थानाभाव के कारण नाम नहीं लिख पा रहा हूं , लेकिन दिल में रहनेवाले सखा.. हितचिंतक इनकी लंबी फेहरिश्त...
मेरे सभी रिश्तेदार तो मेरी जान , मेरी पहचान.. उनके बिना जग सूना !
--- सभी कृष्ण , सखा , गोप अलग अलग क्षेत्र, परिवेश, विचार, भाषा, उम्र के !
कृष्ण के सखा सुदामा के पास मुठ्ठीभर ही सही चावल तो थे.... मैं रिक्त हाथ!... बटोर लेता हूं कुछ छांव के टुकड़े... कुछ धुप के अहसास , कुछ सृजन की बूंदें... कुछ याद के मोती , कुछ विचारों की बौछारें... कुछ सत्य- असत्य की दूरियाॅं , कुछ बुनते जाता सपनें... कुछ चुनते जाता वास्तव ! गढ़ता जाता कुछ गंतव्य के लिये सोपान... बढ़ता जाता क्षितिज की ओर !
लेकिन जब सिंहावलोकन करता ... पाता , अनेक हाथों का सहारा... मैं ; मैं नही रह जाता ... हरेक दायित्व की छोटी बड़ी ध्वजा कंधे पर लेकर उसमें मिटता जाता , जैसे खोडरबर (रबर) मिटाता है पेन्सिल के अक्षरों को.... दूर से केवल दिखते हैं रंगबिरंगी... छोटे बडे़ केतु... आकाश की पृष्ठभूमि पर थोड़े धुंधले.... कुछ अस्पष्ट से.....
*--- सुरेश महादेवराव देशमुख*
(अद्भूत। मनोभावों से देशमुखजी कहीं से भी अभियांत्रिकी नहीं अपितु शुद्ध साहित्यिक लगते हैं। आपने जिस निपुणता से अपने सहपाठियों और सहराहगीरों के प्रति अपने शुद्ध सात्विक भाव अर्पित किए हैं निश्चित ही वे नमन योग्य है। मां सरस्वती आपकी लेखनी में ऐसे ही विराजमान रहकर नित नई ऊंचाइयां प्रदान करें। "सुखवाड़ा" से अपने मनोभावों को साझा कर आपने सुखवाड़ा के पाठकों को एक उच्चस्तरीय शुद्ध सात्विक भावों से परिचित कराया है।सादर।)
आपका *"सुखवाड़ा"* ई-दैनिक और मासिक भारत।
अतुलनीय
ReplyDeleteधन्यवाद जी
Deleteजय श्री कृष्ण
ReplyDeleteआपने हमें युवा साथी के रूप में अपने कार्यों में सहयोग के लिए चुना हम आपके आभारी है अभिनंदन भैया जी
आपके अतुलनीय सहयोग के लिये शतशः धन्यवाद सर
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