Thursday, July 29, 2021

अजब गजब - ७४ : रतनगढ़ वाली माता. bhoyar culture _ भोयर संस्कृति. bhoyari dialect _ भोयरी बोली

अजब गजब - ७४ : रतनगढ़ वाली माता
Bhoyar culture _ भोयर संस्कृति
Bhoyari dialect _ भोयरी बोली

ॐ जय अम्बे मैय्या , जय जगदम्बे मैय्या 
माता रतनगढ़ वाली , पार करो नैय्या 
जय माडुला मैय्या ।

मध्य परदेस म रामपुरा गाव पासिन ५ कि.मी. आन् दतिया पासिन ५५ कि.मी. प रतनगढ़ वाली माता को परसिध्द मंदिर स , उसो च माता को भाई ' कुंवर महाराज ' को मंदिर स . मध्य परदेस , राजस्थान , उत्तर परदेस अन् देसभर  म माता जी ला माननी वाला लाखो भगत स . 
जंगल मंझार येक उच्ची पहाडी पर रतनगढ़ वाली माता को मंदिर स , पर वहान आब कोई गाव नहाय . यहान रतनगढ़ किल्ला को खंडारो स . रतनगढ़ क पहाडी ला तीन आंग कन् सिंध नदी न घेरेस . किल्लो बांधन साठी या साजरी जागा होती . गढ़ को बांधकाम पत्थर कन् करेतो . येक येक दिवाल १२ फीट चवडी ! 
यासिन ८ मयील दूर देवगढ़ को किल्लो स , जेकी हालत आब बी ठीकठाक स . 
१ . इतिहास : * आज पासिन ४०० बरस पह्यले यहान परमार राजो रतनसिंग महाराज को राज होतो . वून ला ७ पोटू अन् येक पोटी होती . राजकुमारी मांडुला ( माडुला ) खूबसुरत अन् गुनवान होती . 
* अलाउद्दीन खिलजी की पापी नजर रतनगढ़ पर पडी . वोनऽ पह्यले सेंवढा सिन रतनगढ़ आवनी वालो पानी बंद कऱ्यो . राजकुमारी मांडुला अन् राजकुमार कुंवर गंगाराम देव न येपर नाराजगी जताई अन् विरोध कऱ्यो . अलाउद्दीन खिलजी की नजर रतनगढ़ रियासत अन् राजकुमारी मांडुला प होती . वोन रतनगढ़ प भारी फऊज लेकन हमलो कऱ्यो . रतनगढ़ नानी सी रियासत होती पर परमार वीर देस साठी जीव देन ला आघ पासऽ नी देखत होता . घनघोर लढाई सुरू भयी . येनऽ लढाई म ६ राजकुमार ला वीरमरण आयो . राजकुमारी मांडुला न ७ वो राजकुमार कुंवर गंगाराम देव तिलक कर लढाई म पठायो . दुसमन की फऊज खूब मोठी होती . आखरी उपाव सोच कन् राजकुमारी मांडुला अन् राजकुमार कुंवर गंगाराम देव न खाई म कुद कन् इज्जत बाचाडी . 
* रतनगढ़ बरबाद भयो . रतनगढ़ बाद म नांद्यो च नी . रात कन् वहान कोनी च ठह्यरत नी होता . रतनगढ़ प राजकुमारी मांडुला अन् राजकुमार कुंवर गंगाराम देव जी की समाधी बांधी , आन् रतनगढ़ सिध्दपीठ बन्यो . राजकुमार कुंवर गंगाराम देव जी क चबुतरा ला  ' कुंवर साहब को चबुतरो ' कोस .
जवर च स्मारक हजीरा स . यहान हजारों मुसलमान ला गाडेस . 
* छत्रपती सिवाजी महाराज ला जब अवरंगजेब न आगरा म बंदी बनायाता , तब रामदास स्वामी रतनगढ़ वाली माता क दरबार म आयाता . वून नि नवस ( मन्नत ) कऱ्यो . रतनगढ़ वाली माता क आसिरवाद कन् छत्रपती सिवाजी महाराज आगरा परिन महाराष्ट्र म आया . नवस ( मन्नत ) कबुल्योतो अन् रतनगढ़ वाली माता को आसिरवाद बी भेट्येतो , तेकन छत्रपती सिवाजी महाराज न इ भव्य मंदिर बनायो . मुसलमान पर विजय की या निस्यानी होय ! 
* १६ अक्तुबर २०१५ ला यहान १९३५ कि.ग्र. की पितरी घंटी लगाइस . या देस म सब सिन भारी - वजनी घंटा स ! येन घंटी की येक खासियत स क , वोला ४ बरस पोटू पासिन ८० बरस क बुजरूक वरी कोनी ला बी बजावता आवस . 

२. मान्यता : * राजकुमार कुंवर गंगाराम देव जी सिध्दपुरूस होतो . जब वूई जंगल मिन जात होता तब जह्यरी जनावर आपरो जह्यर बाहर निकार कन् धरता . जेन मानुस - बाई , जनावर ला सरप बिचू डसस , वून ला कुंवर साहब क नाव कन् बंध लगावस . बंध लगाया कन् जह्यर  फयलत नी अन् जीव बाचस . इ बंध धागा को नी रव्हत , सिरफ कुंवर साहब की आन देय कन् डस्या जागा क भवताल उंगल फेर देस , येला च ' बंध ' कव्हस . 
* राजकुमारी मांडुला अन् राजकुमार कुंवर गंगाराम देव जी म खूब आपसी माया होती . रतनगढ़ म कारतिक उजरी दूज ( भाईदूज) ला यातरा भरस . उसो त नवरातरी पासिन च भगत लोग रतनगढ़ ला आवनी चालू होस . नवरातरी म नव दिन मातारानी की सेवा होस . नवस ( मन्नत ) का बोया ती जवारा अन् परसाद मातारानी ला चढावस . नवरातरी पासिन इ पर्व चालू होस . भाई दूज , पांडव पंचमी पासिन खूब भीड बाहाडस . २५ लाख लोगना रतनगढ़ क दरबार म आवस . 
* कुंवर साहब का जिन ला बंध लगायतो ती तमाम मानुस - जनावर भाईदूज क दिन बंध काटन ला रतनगढ़ आवस . इ बंध जब पुजारी काटस तब बंध वाला ला झ्येंडू ( मूर्च्छा ) आवस . लोगना पकडकन् वून ला कुंवर साहब क चबुतरा की परदकसिना करावस . वोक बास्त वूई ठीक होस आन् वून ला घर जान देस . 
* बुंदेलखंड क हर गाव म येक चबुतरो रव्हस , जेपर दुय इटना धरस . येला कुंवर साहब को चबुतरो कोस . बुंदेलखंड म कुंवर साहब की लोक देवता क रूप म पूंजा होस . 
* रतनगढ़ को भाई दूज को मेलो ( यातरा ) बहिन भाई क अमर आपसी प्रेम की निस्यानी स !
* ८२ बरस उमर का पं. धनीराम कटारे मातारानी क दरबार म पुजारी स . आब वून की या ५ वी पीढी स . 

ॐ जय रतनगढ़ वाली माता की 
ॐ जय कुंवर साहब की..

( सहयोग : इंजि. जालमसिंह जी सोढा , जोधपुर ) 

लेखक : इंजि . सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर



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