मै और सिग्नल
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पहले हमारे शहर में ट्रैफिक सिग्नल नही हुआ करते थे , लेकिन स्कूली किताबों में सिग्नल की जानकारी होती थी . उस समय ट्रैफिक पुलिस अपने इशारों सें ट्रैफिक को नियंत्रित करते थे . बाद मे मुख्य चौराहों पर सिग्नल लगे . रंग से खेलना आसान है , व्यवहार में रंगो की आज्ञा मानना बडा मुश्किल ! लोगों को सिग्नल की आदत नही थी . सिग्नल लाल होने पर ट्रैफिक पुलिस एक मोटा रस्सा आडा पकडते थे . सिग्नल हरा होने पर रस्सा सडक पर छोड देते थे . उस रस्से के उपर से स्कुटर चलाते समय फिसलने का अजीबसा डर रहता था .. कुछ दिन के बाद रस्से गायब हुये .. लोग शायद अभ्यस्त हुये थे.. पर कुछ महान जल्दबाज लोग हरे सिग्नल का इंतजार किये बगैर ट्रैफिक पुलिस के सामने से अपने वाहन तेजी से निकालते थे... यह दौर बदस्तुर आज भी जारी है !
गंतव्य तक जाते जाते सभी सिग्नल हरे मिलना यह तो गुलबकावली के फुल से भी दुर्लभ हुआ .
फिर दौर आया सडकें चौडी बनाने का . कुछ ही दिनों में सडके डिवायडर संग चौडी बनी.. सुकून सा आया.. ट्रैफिक ने भी गहरी सांसें ली और नयी चमचमाती सडकों का आनंद लेना प्रारंभ किया . सिग्नल के भीड की आपाधापी कम हुई . ट्रैफिक लेन के हिसाब से चलनी लगी . सभी चौराहों पर सिग्नल लगे . अब सिग्नल में भी एक लुभावना फर्क आया... वे स्मार्ट हुये . रंग के साथ डिजिटल टायमर घडी भी लगी . अब सिग्नल पर कितनी देर रुकना है , यह ज्ञात होने लगा ! इंजिन चालू रखना है या बंद करना है , यह समझने लगा .
हमारा शहर पुतलों का ! सडके चौडी बनाने समय चौराहे के मध्य स्थापित पुतलों को किनारे स्थानांतरित किया . पता नही क्यो मुझे उन्हे देख कर ऐसा लगने लगा की वे सिकुड कर अपराधभाव ओढ़कर खडे है .
लोग चलते रहे.. ट्रैफिक बहती रही ... बढ़ती रही . सुंदर फुटपाथ अब दुकान , रेहडी लगाने की , वाहन पार्क करने की जगह बनी . पैदल चलने वालों को ना पहले जगह थी ना अब जगह थी . सडक किनारे चलना या सडक क्राॅस करना पहले भी सर्कसनुमा काम था और आज भी वही हालात थे .
सायकल और सायकल रिक्षा नदारद हुये... चारपहियां वाहनों की संख्या बेतहाशा बढ़ी . अब ट्रैफिक के हिसाब से सडके पहले जैसी तंग नजर आनी लगी . सिग्नल के पिछे मेले जैसी भीड इकठ्ठा हो जाती .
' कर्रऽ कच्चऽऽ...' इस ब्रेक और टायर घिसने के आवाज की वारंवारिता में इजाफा हुआ . काली सडक पर गहरे काले रंग के निशान बढ़े . दुर्घटनाओं में वृध्दी हुई . सर पर हेल्मेट पहनना अनिवार्य है , यह बात बहुत सारे सर में घुंसी ही नही .
ट्रैफिक पुलिस अब धूप बरसात में खडे नही रहते . उन के लिये बनाए शेड तो विरह वेदना से ग्रस्त...
सडक के दुभाजक और ट्रैफिक आयलंड को अब नया काम पकडा दिया . हर राजनैतिक पार्टी , छोटे बडे संगठन , बस्ती के महान विभूतीयों की जन्मदिवस , आगमन , शुभकामनाएं की छवी उन के कंधे पर टंगने लगी . हर धर्म - जाती के त्यौहारों के पोस्टर्स , झंडे , तोरन ट्रैफिक सिग्नल से लेकर स्ट्रीट लाईट के खंबों को सुशोभित करने लगे . भला केबल वालें पिछे क्यों रहते ? खंबो खंबों से बुनने लगा केबल का मकडीजाल शहर में ! ट्रैफिक आवाज और प्रदुषण की तयशुदा मर्यादा तो कब की भंग हो चुकी थी . मोबाईल के बडे बडे टॉवर चढ़ बैठे इमारतों पर और डिवायडर पर . केबल का जाल केवल उपर ही नही बल्की सडक किनारे भूमिगत भी फैला सुरसा की तरह पुरे शहर में ! नाराज हुई प्रकृती. अब चिडिया नही चहकती आंगण में !
सिग्नल पर ट्रैफिक बढ़ता गया . एक हरे सिग्नल मे आधी ट्रैफिक ही पार हो पाती . सिग्नल पर वाहन रुकने का समय बढ़ता गया . इस बढ़ते समय के कुछ जौहरी थे . प्रॉपर्टी बेचने , घर बैठे पैसे कमाए और कई सारे विज्ञापन बांटने की जगह बन गया सिग्नल ! अब सिग्नल केवल ट्रैफिक नियंत्रित करने का साधनमात्र ही नही था . उसने अपनी दुनिया बसा ली . अपनी संस्कृती बनाई . सिग्नल पर वाहन तो अस्थाई थे पर सिग्नल का कुनबा स्थाई था , जिस में ट्रैफिक पुलिस , तरह तरह के विक्रेता , विज्ञापन दाता , भिकारी होते है .
दंड , लालच , भूक , भावना यह हथियार बडे काम के ! बहती ट्रैफिक में से कुछ एक जेबें हत्थे चढ़ ही जाती है .
ट्रैफिक बहती रहती है ... सिग्नल थमते , चालू होते ... लाल , पिला , हरा रंग चमकते रहता पल पल ... स्याह रंग के पृष्ठभूमि पर ..!
फिर मेट्रो और सिमेंट के सडकों का जाल बुनने की तैयारी ..एक तरफ से लेन बंद .... कही रोडा... कही भारी भरकम मशिनरीज . अब ट्रैफिक रक्तवाहिनीयों में ब्लॉकेजेस की वजह से बहते रक्त की तरह अवरुद्ध होती सी बहती है . सुबह शाम तो ट्रैफिक का सैलाब .... कर्णकर्कश हॉर्न , इंजिनों की निरंतर ध्वनी ... सडक नदारद .. केवल वाहनों के छत ही नजर आते है ... खुद को असंख्य मकडीयों के जाल में फंसा महसूस करता हूं . .. दम घुटते जाता... बेचैनी सी छाती हुई मनमस्तिष्क मे .
' टकऽ टकऽ टकऽ.... ' इस आवाज के साथ अचानक कार की विंडो पर झुलती हुई छाया .. धुंधली सी... मै हडबडी में उतारता हू शिशा यंत्रवत !
' बाबूजी ऽ...' एक धुंधला श्यामल पंजा बढ़ता है मेरी ओर ... मै अचेतन... पिछे से जोर जोर से हॉर्न बजने शुरु होते है ... आगे हरा रंग चिढ़ाते हुए.....
लेखक : इंजि . सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर
Khub sajri jankari
ReplyDeleteरंगों से हमारे व्यवहार को रास्ते पर चलते हुए बहुत ही शानदार लिखा है।
ReplyDeleteधन्यवाद जी
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