Thursday, April 28, 2022

जंग ( कविता )

जंग

गरल अहंकार का
स्वार्थ का काला भुजंग
पीती निष्पाप का लहू
ज़लज़ले जैसी जंग ।

उजडते घरद्वार
चारों ओर हुडदंग
सीमा पर उपजता
नासूर ये बदरंग ।

भयभीत नर नारी
जंग देख कर दंग
फ़िज़ा में घुलता जाता
निराशा का स्याह रंग ।

क्रौर्य के इस खेल में
सदाशयता बैरंग
लीलती है मानवता
यह पीडा की सुरंग ।

सर्वनाश को आतुर
बर्बरता का ये ढंग
कौन जीता कौन हारा
नही बतलाती जंग ।

रचना : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

1 comment:

  1. जंग से हमेशा नाश होता है।
    बहुत बढ़िया

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