जंग
गरल अहंकार का
स्वार्थ का काला भुजंग
पीती निष्पाप का लहू
ज़लज़ले जैसी जंग ।
उजडते घरद्वार
चारों ओर हुडदंग
सीमा पर उपजता
नासूर ये बदरंग ।
भयभीत नर नारी
जंग देख कर दंग
फ़िज़ा में घुलता जाता
निराशा का स्याह रंग ।
क्रौर्य के इस खेल में
सदाशयता बैरंग
लीलती है मानवता
यह पीडा की सुरंग ।
सर्वनाश को आतुर
बर्बरता का ये ढंग
कौन जीता कौन हारा
नही बतलाती जंग ।
रचना : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर
जंग से हमेशा नाश होता है।
ReplyDeleteबहुत बढ़िया