पुन्य सलिला ( सरोसती )
Bhoyar culture _ भोयर संस्कृति
Bhoyari dialect _ भोयरी बोली
इमं मे गंगे यमुने सरस्वती शुतुद्रि स्तोमं सचता परुष्णा असिक्न्या मरूदूधे वितस्तयार्जीकीये श्रृणुह्या सुषोमयां ।
_ ऋग्वेद : नदी सुक्त
नदी दवडस - धावस पहाड परीन खलतऽ , कुदत - फांदत सीधी उतार परीन बेपरवा नान्ही सी भोरी पोटी सरखी ! वोक कलकल क हासन को आवाज भरमावस आपरंगच . देऊर क घंटी को नाद गुंजस वोकऽ पायपट्टी वानी . वा लाजस आन् चाल पडस आघ किलोल करत आपलच मस्ती म.. आपलच धुंद म .
येकदम कोचंबस वा आघ पहाड क खलतऽ को लवन देख कन् .... जवान पोटी वानी वा ठीकठाक करस खुद ला आन् येक येक पाय धरस मोठऽ सलीका कन् .... अचंभा कन् देखस चारी आंग आपलऽ जोस ला लगाम लगाय कन् . वोला आदत नी होती असो चालन की . खेलकूद करती तरंगिनी होय जास उलिसी समझदार . तोड्डीना आब हलकी हलकी बाजस . जरासो वजन बी बाहाडेस वोको सायद .
देखता - देखता रफाड म आय जास वा सरल सकवार पोटी . कयी सोबतीन , सखी - सहेलीना बी आय जास गोस्टीमाता करन साठी . संग चाल - चाल कन् मिर जास येक दुसरी म ..... साजरी आंग म भरस वा आपसूकच .... हरु हरु चालत जास गजगामिनी सरिता.... चारु चंदर क वानी सोरा कला वाली .
मोठ - मोठा घाट आन् लोगना क भीड को मावरो पड जास तटिनी ला . इ सबन देख कन् माय वानी हिरदो भर कन् आवस तरनी को ...
येकदम गजब हुंकार आयकन ला आवस वोला . ... कादा - चिक्खल म धसत जास वोका पाय .... चिढ कन् बगर जास वोको पानी.... बुनत जास पानी को जारो .
कोचंब कन् थांबस वा.... भेबारस बी येतरो मोठो समुंदर देख कन्.......
तडफड कन् मिर जास समुंदर ला... मजबूरी कन् .
कवि कल्पना की लह्यरना नी देख सकत वोका आसू !
पर येला येक अपवाद बी स नदीतमा को ! आपलऽ मवजुदगी ला डाव पर लगाय कन् लुक गयी वा धरती माय क कोरा म .....
वेदवती को करम अन् धरम बी बेगरो पावन....
वेद स्मृति की महिमा मनभावन....
हरहवती.... माय सरोसती... अमरित पानी सरी उदकवती...
नी लवन नी मरन , पुन्य सलिला हे अन्नवती .
लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर
जय मां सरस्वती।
ReplyDeleteखूब साजरी रचना
धन्यवाद नन्दलाल जी 🙏🙏
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