भोयरी संस्कृति - ३४ : उन्ना - पूर्रा
Bhoyar culture _ भोयर संस्कृति
Bhoyari dialect _ भोयरी बोली
पुरानऽ जमाना पासिन भोयर समाज का तिज तिवार , ब्याह इ कोनऽ उत्सव सिन कम नी रव्हत होता . वोम बी ब्याह को उत्सव त १५ - १५ दिन चलत होतो . आब भागदवड क वातावरन म इ तीन दिन प आयो . तेकन कयी परंपरा , दस्तुर आब देखन ला नी भेटत . गाव खेडा म तरी बी कयी दस्तुर , परंपरा , रसम देखन ला भेटस . गाव न रसम , दस्तुर , परंपरा आन् बोली ला बाचाडकन् धरेस .
स्यादी बिह्या की येक येक रसम , परंपरा म कोनतो न् कोनतो सबक रवस . काल क फेरा संग सबन ला च बदलनो पडस . पर बिह्या सरखी मंगल संस्था ला मजबूती देती , लाडा - लाडी क जलम जलम क अटूट बंधन ला बांधती आन् जिंदगानी जगन साठी सबक देती इ रसम , दस्तुर , परंपरा भोयरी संस्कृति की धरोहर - पह्यचान स !
लाडी क घर बिह्या की विधी होस . येक दुसरा ला हार घालकन् लाडा - लाडी येक दुसरा का होय जास . हार पह्यनायकन् येक दुसरा ला हार जास..... या हार वून क साठी उपहार बन जास . सात फेरा लेयकन् जिंदगी भर नी हारन को , असो संकल्प लेस .
बिह्या भया बास्त लाडी लाडा क घर आवस... आब वूच वोको घर रव्हस ! यहान लाडा - लाडी क मंझार येक होड धरस , जेला " उन्ना - पूर्रा " ( विस्यम - सम ) कोस . बिह्या क बाद लाडो जब पह्यली बेरा लाडी ला आपलऽ घर ल्यावस तब इ ' उन्ना - पूर्रा '
को खेल होस . येन खेल कन् लाडा - लाडी ला हार जीत मज्या देखन ला भेटस . जिंदगी म चढ उतार , सुख दुख आत जात रव्हस .... येनऽ जिंदगी की सच्चाई को पह्यलो सबक उन्ना - पूर्रा खेलकन् लाडा - लाडी ला सिखन ला भेटस .
उन्ना - पूर्रा क खेल म चिचोरा ( चिच का बीज ) ला बापरस . १,३,५,७,९..... ( विस्यम संख्या ) ला उन्ना आन् २,४,६,८ ...( सम संख्या ) ला पूर्रा कोस . लाडा - लाडी आपापलऽ मूठ म चिचोरा लुकायकन् धरस . आब दुसरा क मूठ म चिचोरा उन्ना स क पूर्रा , इ अंदाजा कन् वोरखनो लागस . लाडा - लाडी येक दुसरा ला पुसस , उन्ना क पूर्रा ? जी बराबर सांगस ती जीतस . आन् हारनी वाला क मूठ म का चिचोरा वोका होस . कब कब मुठ्ठी खाली धरकन् बी उन्ना - पूर्रा पुसस . गलत जवाब दे त आपलऽ जवर का ५ चिचोरा देनो लागस . येन खेल को पुरो परिवार मजा लेस .
उसी त लाडी लाजत लाजत खेलस . लाडो दिलखुलास खेलस . अगर लाडी हारत होयेन त् लाडो खुदच हारन ला लागस . लाडी ला कोनी न चिडाये नी पाह्यजे , तेकऽ साठी लाडो खुद होयकन् हारस . इ खेल लाडा - लाडी क मन ला जोडन को काम करस . आपलऽ मानुस साठी हार कन् बी जीतनो , या बात इ खेल सिखावस . हारनो आपलऽ जिंदगी को हिस्सो स , वोला स्विकार कऱ्या पायजे , यी सबक उन्ना - पूर्रा खेल मिन भेटस .
हासी - खुसी क माहोल म , पुरऽ परिवार क संग उन्नो - पूर्रा खेल खेलकन् मन ला मन जुडस आन् नवाडोपन बी दूर होस ...
हजारों बरस पासिन चली आय रहीस उन्ना - पूर्रा जसो लाडा - लाडी को खेल , भोयरी संस्कृति की पह्यचान स ...
लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर
👌👍खूब साजरी माहिती
ReplyDeleteबहुत बढ़िया भैय्या जी
ReplyDeleteअभिनंदन
धन्यवाद सर
Deleteबढ़िया, आपण ला याद स यू खेल
ReplyDeleteधन्यवाद सर..🙏🤗
ReplyDeleteभोयरी परंपरा,अन रितीरिवाज की खूब साजरी जाणकारी।
ReplyDeleteधन्यवाद सर
Deleteउन्ना..पुर्रा...भोयरी परंपरा सविस्तर माहिती...धन्यवाद
ReplyDeleteधन्यवाद सर
Delete