Friday, August 28, 2020

झड ( भोयरी कविता )

झड

Bhoyari dialect _ भोयरी बोली
Bhoyar people _ भोयर लोग

सारऽ खेत मऽ डोबरा
लागी असी दादा झड
बुझी सपना की आग
बाची सिरफ राखड ।धृ.।

पडी पिवरी पराटी
झर्र पाझरे बरड
नही निंदन डवरा
लुकी तन म परड ।१।

चुल पेटेन कसी गा
वल्लो चिप भये सुड
उडी कवल घर की
थरथरे गिलो कुड ।२।

हात पाय गा ठाठऱ्या
ठंडी भयी धडपड
डोरा आघऽ हार गये
म्हरो फसल को गड ।३।

वली वलीच सपरी
सारा बस्यास उकड
पडे पुरो आंग ढिलो
गयी निकर अकड ।४।

घर आवार सादरे
बाजे रिकामा भदाड
अवटरी जिंदगानी
खसी आंगना की बाड ।५।

पाती संतरा की गर
भुंडा भया झाड पेड
सारो सिवार पानी म
डुबी खरा की गा मेढ ।६।

रचना : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

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