Sunday, August 9, 2020

भोयरी संस्कृति - १८ : तुरसी को ब्याह

भोयरी संस्कृति - १८ : तुरसी को ब्याह 

वृंदा वृन्दावनी विश्वपूजिता विश्व पावनी ।
पुष्पसारा नन्दनी च तुलसी कृष्ण जीवनी ।
एतभामांष्टक चैव स्त्रोतं नामर्थ संयुक्तम् ।
य: पठेत तां च सम्पूज्य् सौश्रमेघ फलंलमेता ।।

भोयरी संस्कृति मऽ कारतिक मह्यना कऽ अंधारी येकादसी ( ग्यारस ) पासिन कारतिक पुनव पावतर क दिन म तुरसी को ब्याह लगावस . येनऽ येकादसी ( ग्यारस ) ला चतुरमास खतम होय जास आन् येलाच देव उठनी येकादसी बी कोस .

१ . मान्यता :  * पुरानऽ जमाना मऽ जलंधर नाव क दयीत नऽ चवठायी उतपात मचायतो . वू मोठो वीर आन् बलवान होतो . वोकऽ ताकत को राज होतो , वोकी लाडी ' वृंदा ' को पतिवरता धरम ! तेकन वू कोनीला च हारत नि होतो . जलंधर क उतपात कन् परेस्यान सारो देवगन गयो भगवान बिस्नूदेव क घर . सबन बात आयक कन् भगवान बिस्नूदेव नऽ ' वृंदा ' को पतिवरता धरम भरस्ट करन को सोच्यो . भगवान बिस्नु न जलंधर को रूप धऱ्यो आन् कपट कन् ' वृंदा ' ला हात लगायो . वोको लाडो जलंधर देवलोग संगऽ लढाई कर रहेतो . जसो यी ' वृंदा ' को सतीत्व भंग्यो उसोच जलंधर को कट्यो मुंडको वोकऽ आंगना म पडे . जब ' वृंदा ' न यी देख्यो त् वोको डोकसो भन्नाये... वा रागतम कन् भडक गयी . वोनऽ कह्ये क , कोन ऽ वोला कपट कन् हात लगायो ?  आघऽ साकस्यात भगवान बिस्नूदेव परगट भया . ' वृंदा ' न भगवान बिस्नूदेव ला सराप देये क् , " जसो तुमीनऽ म्हरऽ संगं कपट करे , उसोच तुमारऽ लाडी ला बी कोनी कपट कन् जबरदस्ती उठायकन् ले जायेन आन् वोकऽ याद म तडफन साठी तुमाला भू लोक म जलम लेनो पडेन ." 
सराप देन क बाद ' वृंदा ' आपलऽ लाडा संगऽ सती गयी . वोकऽ सराप कन् च भगवान सिरी राम न अजुध्या म जलम ले आन् रावन क कारन वून ला सीता माय क याद म तडपनो पडे . 
ज्यान ' वृंदा ' सती भयीती वहान तुरसी को झाड उगे . त वा ' वृंदा ' मनजे च ' तुरसी माय .' 
* दुसरऽ मान्यता क अनुसार सुरवात की कथा सरखी च स पर सराप बेगरो स . दसरऽ कथा म ' वृंदा ' न भगवान बिस्नूदेव ला सराप देये क् , " तुमीनऽ म्हरो सतीत्व को नास करेस तेकन तुमी गोटो बनेन . आन् येन कारऽ दगुड ( गोटा );ला च स्यालिगराम कव्हस . भगवान बिस्नु न कह्ये क् , ' हे ' वृंदा ' , मु तुमारऽ सतीत्व को मान करूस . आन् तू ' तुरसी ' बनकन् हरमेस म्हरऽ संगच रहेन .कारतिक येकादसी ( ग्यारस ) ला जी लोगना म्हरऽ संगं तुमारो ब्याह लगायेन , वून की सबन इच्छा पुरी होयेन .' 
* समुंदर मंथन मिन अमरित निकरे . तब वोका कयी ठेंब जमिन पर पड्या . वोमिन च ' तुरसी ' येन झाड को जलम भये , असी मान्यता सऽ .
* तुरसी क पान बिना भगवान बिस्नूदेव की पूंजा अधुरी मानस . 
* पद्म पुरान कऽ अनुसार कारतिक अंधारी येकादसी को तुरसी ब्याह सुभ मानेस .

२ . पूंजा :  तुरसी ब्याह क दिन घर ला आम्बा का पान आन् झ्येंडू क फुल की तोरन बांधस .तुरसी माय को घर बिंदराबन ! बिंदराबन ला गेरु , चुना कन् पोतस . रंग कन् डिझाईन , चितरंग काहाडस . ' बोर भाजी आवरो , किस्न देव सावरो ' असो बी लिखस .
आंगना म अस्टदल कमल को चऊक पुरकन् वोपर दुय पिढाना मांडस .येक पिढा पर बिंदराबन आन् दुसरऽ पिढा पर किस्नदेव की मूरती मांडस . पिढा क भवताल चऊक पुरस .तुरसी क आघऽ तूप को दिवो लगावस . भगवान सिरीकिस्न देव की मूरती नी त् स्यालिगराम आन् तुरसी पर हरद - तेल लगायकन् पानी डावस . जवारी / ऊस क पाच ढांडाना की खोपडी बिंदराबन पर लगावस . खोपडी क भवताल दिवा लगावस . भगवान सिरीकिस्न देव क पिढा पर कलस आन् खान क पान पर सुपारी धरकन् गनेस जी मांडस . तुरसी ला गजरो , हार , मंगरसूत्र , हिवरो चुडो , जोडवा , कोरऽ कपडा कन् सजावस . बिंदराबन म बोर , चिच , आवरो , सिताफर धरस . मंग पूंजा करस . पूंजा भया बाद तुरसी आन् किस्नदेव क मंझार अंतरपाट धरकन् मंगलास्टक कोस . फुल ला अकसिद सरखा डावस . ब्याह लाग्या पर आरती करस . पोटुबाटुना दिवारी का बाच्या ती फटाका फोडस . फरार - उसर को परसाद बाटस .
* तुरसी को ब्याह लाग्या पर लोगना स्यादी ब्याह को दिन ( मोह्यतूर ) काढस . 

लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर .

8 comments:

  1. तूरसी क ब्‍याह की परंपरा की खूब साजरी माहिती दीस.अभिनंदन

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  2. 👌👍 भोयरी परंपरा की खुब साजरी माहिती

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  3. 👌👍 भोयरी परंपरा की खुब साजरी माहिती

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  4. 🌿 तुलसी माता की जय

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  5. 🌿 तुलसी माता की जय

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  6. एकदम मस्त माहिती, सारो सार सारासार जबरदस्त!

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