Tuesday, August 11, 2020

भोयरी संस्कृति - १७ , भाग - ५: दिवारी : लक्षुमी पूंजा

भोयरी संस्कृति - १७ , भाग - ५ : दिवारी : लक्षुमी पूंजा

ॐ श्री ल्कीं महालक्ष्मी महालक्ष्मी एह्येहि सर्व सौभाग्यं देहि मे स्वाहा ।।

दिवारी क अवस ला झाल पड्या बाद लक्षुमी पूंजा करस .
१ . इतिहास :  * पुरानऽ जमाना मऽ दिवारी क रात ला कुबेर पूंजा होत होती . 
* गुप्त राजाना क बखत वैस्नव पंथ ला राजा को आसरो / बढावो भेट्यो . तब कुबेर संगच लक्षुमी देवी की पूंजा चालू भयी .
* कुस्यान राज क अवसेस म कुबेर आन् लक्षुमी देवी की येकसाथ वाली मूरती भेटीस . कयी मूरती म कुबेर संग वोकी लाडी  ' इरिती' बी दिसस . 
* आबऽ इरिती क जागऽ लक्षुमी देवी आन् कुबेर क जागऽ भगवान गनपति रव्हस .
* अलक्षुमी मनून जेनऽ देवीना ला अरधी रात कन् हाकलन को रिवाज सऽ , वून को नाव जेस्ठा ( ज्येष्ठा ) , सटवी ( षष्टी ) , निर्रुती ( निर्ऋती ) स . निर्ऋती या सिंधू संस्कृती म की मातामाय ( मातृदेवता ) स , असो मानस . दुरगासप्तसती ( दुर्गासप्तशती ) म येकी जानकारी स .

२ . रिवाज : भोयरी संस्कृति मऽ दिवारी अवस ला लक्षुमी पूंजा करस . झुंझुरका पासिन च घर म धांधल रव्हस . सूर्व्यदेव निकरन क् पह्यलेच सबन को न्हावनो - धोवनो , वोवारनो होय जास . दही - सेवरी / दूध - सेवरी की निहारी करकन् सबन काम ला लागस . आंबा का पत्ता , झ्यंडू क फूलना की तोरन बांधस . आंगना म रंगीत कागज की तोरन बांधस . आवार क गेट जवर बेरु कन् कमान बनायकन् वोला रंगीत कागज , झ्यंडू का फुल , सिंद की फानटी , आंबा क डंगाली कन् सजावस . गोंधन पर चवथो गोंधन मांडस .धाबा को घर होयेन त् वोका खांबना , दडपा ला , पाटीना ला तेलपानी कन् चमकावस . कोनी कोनी क घर म ( जेक्यान गाय - महिसना जास्त होयेन असा कऽ .) सनई - ढोल बजावनी वाला परधान आन् राधा - सिरीकिस्न को रूप धरकन् नाचनी वाला बी आवस . सारऽ घर , येटार , गाव म दम् दम् ऽऽ...
मोठऽ पारग कन् बाईलोगना आंगना म चऊक पुरन ला लागस .पोटुबाटुना बी मंझार मंझार म करस ! चवरी जवर चवरंग , पूंजा को सामान तयार ठेवस . झालपड्या गायना गाव जवर आया पर सनई - ढोल वाला , नाच्याना , मस्याल धरकन् म्हाली , फटाका - सनकाडी लेकन पोटुना , गडी मानुसना  , देखनी वाला वहान जास आन् गाज्या बाज्या कन् गायना ला गाव क देउर पासिन घुमायकन् घर ल्यावस . सबन लोग नवा कपडा पेहेरकन् लक्षुमी पूंजा करस . चवरंग क खलतऽ वोलऽ चऊर क पीठ कन् चऊक पुरस . चवरंग पर चऊर की रास धरकन् वोपर लक्षुमी देवी , गनपति , कलस , सोना - नाना को इसरो , नवो कपडो , चांदी का रुप्या , नोटना की गड्डी , बही खातो मांडस . येन दिन नवऽ फडा की बी लक्षुमी समजकन् पूंजा करस . घर क फरार , पकवान , मिठाई , फल को निवद रव्हस . सेंदूर कन् दरुजा कऽ दुय बाजू कितऽ ' सुभ - लाभ ' लिखस . ( गनपति क पोटुना को नाव .) लक्षुमी पूंजा भया पर गायना की पूंजा करकन् वून ला निवद देस . 
पूंजा भया पर पोटुबाटूना संगच सबन की फटाका फोडन की होडच लागस . घर पर , रस्ता पर दिवनाल क दिवा की रांग , लायटिंग की झगमग , अगास मऽ झलारतो अगास दिवो , चेहरा पर खुसी की चमक , फटाका की आतसबाजी , मिठाई की भरमार कन् या अवस की रात अगासगंगा सरखी उजरस...झलारस...! सुख उन्नती को , उजारा को इ पर्व !

लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर 

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