भोयरी संस्कृति - १६ : आठवी ( करवाथय )
भोयरी संस्कृति मऽ आठवी को तिवार विसेस सऽ . आठवी पासिन चवथऽ दिन दिवारी की सुरवात होस वसुबारस कन् . माडी पासिन आठवऽ दिन आवस आठवी . भोयरी संस्कृति मऽ सूर्व्यपूंजा आन् चंदरपूंजा को खास महत्त्व आन् पूंजा की पुरानी परम्परा सऽ . आठवी तिवार कऽ बखत घाडी ठंढी रव्हस . गहू , सोलो , बटानो , जवस , उनारी भुईमूंग असी कठान बोवन की धांधल रव्हस ; कोनी कोनी की बोयकन् होय जास .
आमारी फसल आवस सूर्व्यदेव की किरपा कन् . आमारी फसल , आमारी लक्षुमी ! अगास मऽ सूर्व्य आन् चंदर कोच आकार मोठो दिसस.. आमारऽ जीवन पर वून कोच असर दिसस ... दिन - रात सूर्व्य चंदर कनच होस ... वून कच हिसाबकन् कास्तकारी को फेर चलस .
आसिन मह्यना कऽ अंधारी अस्टमी ( महाराष्ट्र ) आन् कारतिक मह्यना कऽ अंधारी अस्टमी ( मध्यप्रदेश , उत्तर भारत ) ला येकच दिन आठवी को तिवार आवस . ( महाराष्ट्र मऽ मह्यनो अवस पासिन चालू होस . मध्यप्रदेश , उत्तर भारत मऽ मह्यनो पुनव पासिन चालू होस .) मध्यप्रदेश मऽ आठवी ला च करवाथय कोस .
१. मान्यता आन् पुरानी परम्परा : * सिरी वेद व्यास जी नऽ गांधारी आन् कुंती ला ' गजलक्षुमी ' व्रत करन ला सांगे . येनऽ व्रत की पूंजा आसिन कऽ अंधारी अस्टमी ला करस . गांधारी कऽ सव पोटुना नऽ पूंजा साठी मोठ्ठो माती को हत्ती बनायो . गांधारी नऽ सबन बाईलोगना ला पूंजा साठी बलायो . कुंती क्यान कोनीच नही आया . जब पांडव घर मऽ आया त् माय कुंती ला उदास देखकन् पुस्या क् का भयो ? काहे उदास सऽ माय ? पूंजा की तयारी बी नही करीस ? ... तब कुंती नऽ सांगे , वून की पूंजा , हत्ती सारो मोठो .. तेकन सबन बाईलोगना गांधारी कऽ महाल मऽ गयीस . तब अरजून नऽ कह्ये , ' मोठी माय नऽ माती कऽ हत्ती पर लक्षुमी की पूंजा मांडीस , मु तोला पूंजा साठी सरग मिन अयरावत ला लायकन् देऊस . पूंजा की तयारी करो...'
अरजून नऽ बान मारकन् अयरावत ला आवतन धाडे . कुंती नऽ अयरावत ला आंगना मऽ उभो करन कऽ जागा पर चऊक पुरे . वोपर रेसम को कपडो हाथरे . सरग मिन अयरावत उतऱ्यो . सारा लोगना , पोटुबाटु वहान जमा भया . गांधारी कऽ पूंजा मऽ गयी वूई सबन बाईलोगना कुंती कऽ घर आयी . पाय धरन ला जागा नही होती .... पुरो घर ठसाठस भर गयो . बामन नऽ महालक्षुमी की मूरती अयरावत पर धरकन पूंजा मांडी . सबन नऽ पूंजा करी . अयरावत ला पाची पकवान को भोग लगायकन् जमुना को पानी पाजे . रात भर भजन - किरतन चाल्यो . दुसरऽ दिन सकारी महालक्षुमी ( गजलक्षुमी ) की मूरती ला सिराये आन् अयरावत ला बिदा करे .
आठवी कऽ फड पर गजलक्षुमी कोच चितरंग रव्हस . वोमऽ को येक माती को हत्ती गांधारी को आन् अयरावत हत्ती कुंती को !
२ . विसेसता : * गजलक्षुमी की पूंजा मालवा , बुंदेलखंड परिन भोयर समाज नऽ संग लायीस आन् वोला सूर्व्य - चंदर पूंजा सिन जोडकन् घाडोच साजरो रूप देयेस . भोयरी संस्कृति मऽ सनतिवार , रितीरिवाज की असी इतिहास की परम्परा सऽ .
* आंग पर मस ना आवत होयेन त् पूंजा कऽ गाडगा / करा मऽ मिरा डावस आन् उपास करस .आंग पर स्येरनी ( पांढरा डाग / चट्टा ) भयी होयेन त् पूंजा कऽ गाडगा / करा मऽ सेरनी ( फल ) डावस आन् उपास करस . येनऽ पूंजा कन् मस्सा आन् स्येरनी जास असी मान्यता सऽ .
* करनाटक मऽ येळ अवस ( वेळ अमावास्या ) को तिवार थोडोबूत असोच सऽ पन् वा पूंजा खेत मऽ होस .
* पूंजा मऽ जी पाच खडाना धरस आन् पूंजा करस वूई पाच पांडव का प्रतिक सऽ .
* महालक्षुमी ला आंबिल कऽ निवद को नेम सऽ , तेकन आठवी ला आंबिल करस .
* गाडगा / करा यी स्यक्ति , धरती आन् गरभ का प्रतिक .
३ . पूंजा : आंगना मऽ चऊक पुरस . वोपर पिढो धरस . वोपर जवारी कऽ पाच धांडाना की ( कनिस वाला धांडा ) खोपडी मांडस . खोपडी ला आंबाडी को डाखरो बी बांधस . पिढा पर आठवी का बान धरस . पूंजा को येक गाडगो / करो झाकन को आन् येक बिना झाकन को रव्हस . बिना झाकन वालो सूर्व्यदेव साठी आन् झाकन वालो चंदरदेव साठी . सूर्व्यदेव आन् चंदरदेव कऽ पुरी मंझार रवो - साखर को सारन भरस . पुरी कऽ काठ ला उंगल कन् दबायकन् किरन सरखी साजरी डिझाईन बनावस . वोपर कनिक को दिवो धरस . गाडगा / करा कऽ गरा ला सूत गुंडारस . हरद कुकू का पाच बोट ना लगायकन् कुकू कन् सस्तिक काढस . कनिक का गोड आन् टिखट अंगार - भंगार तरकन् बनावस , वोला च चटुरा - बटुरा बी कोस . इन ला तरा तरा कऽ आकार मऽ बनावस . जसा बेनी , फनी , नथनी , डाबलो , बंगडी.... . इन ला दोनी गाडगा / करा मऽ डावस . चिच , आरोनी , बोर , आवरो , निंबोरी इ फल बी दोनी गाडगा / करा मऽ डावस , आन् अकसिदना डावस .
पिढा पर पाच खडा ( पांडव का प्रतिक ) धरस . बिडा कऽ पान पर सुपारी धरकन् गनेस मांडस . गजलक्षुमी कऽ चितरंग को फड मांडस . दिवो - उदबत्ती लगावस . हरद कुकू , फुल ,अकसिद कन् धांडा की खोपडी , दिवो , गाडगा / करा , पाच पांडव , गजलक्षुमी को फड , नारेल , आंबिल को भांडो इन की पूंजा करस . धूप , निवद धरस . महालक्षुमी को मान को निवद मनजे आंबिल . रात मऽ चंदर जब माथा पर आयेन तब या पूंजा करस. रात मऽ चंदरदेव , गजलक्षुमी माय आन् पाच पांडव की पूंजा होस . आरती - पूंजा करकन् नमस्कार करस . वा पूंजा उसीच धरस .
दुसरऽ दिन दिन मऽ सूर्व्य देव की पूंजा होस . निवद , धूप , आरती , पूंजा होन कऽ बाद आंबिल को परसाद आन् सेरनी बाटस .
निसर्ग पूंजा , गजलक्षुमी पूंजा , पांडव पूंजा को यी भोयरी संस्कृति को तिवार इतिहास , सूर्व्यदेव - चंदरदेव साठी की स्रध्दा , कास्तकारी , सुख - उन्नती की कामना , आपली महान परम्परा को सुमिरन को पवितर , अनुठो , मोठो स्रध्दा वालो तिवार सऽ .
इ अनोखोपन च भोयरी संस्कृति की महान परम्परा , इतिहास को दरस्यन घडावस . ...
जय जय गजलक्षुमी माय
जय जय सूर्व्यदेव चंदरदेव
जय जय माय कुंती , पांडव......
( सहयोग : पार्वतीबाई महादेवराव देशमुख )
लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर
👌👍
ReplyDeleteसन तिवार की खुब साजरी माहिती
धन्यवाद मनोज दा
Delete👌👍
ReplyDeleteसन तिवार की खुब साजरी माहिती
धन्यवाद मनोज गोरे जी
Deleteखूब साजरो लेख
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