विजयपथ - १ : आरंभ बिंदू
परिक्षा के परिणाम घोषित होने पर आनंद - खुशी और विषाद के हिंडोले पर झुलता हुआ आपका मन - मस्तिष्क .अनगिनत प्रश्नचिन्हों से मची होगी हलचल , आया होगा तुफान दिमाग में ! सलाह - मशवरों की बाढ.... अपेक्षाओं का बोझ और असंमजस के बादलों से घिरा हुआ आपका इंद्रधनुषी सपना....
सपने सुहाने लडकपन के........
मेरे नैना में डोले बहार बन के..
और घर में ___
पापा कहते है , बडा नाम करेगा
बेटा हमारा ऐसा काम करेगा...
हम समाज में रहते है . हमारे जन्म से सिखते है हम बोलना , चलना , चिजों को देखना , तथ्य परखना , सपने बुनना ! हमारी बोल चाल , रंग ढंग , सोच विचार बनने में बुनियादी प्रभाव रहता है ...... परिवार , परिवेश और समाज का . हमारे सोचने के संदर्भ , परिमाण हमें प्रदान करता है परिवार और परिवेश . हमारे बनने - बिगडने मे इन की मुख्य भूमिका रहती है .
समाज के सुचारु संचालन और उन्नती के लिये बनी है व्यवस्थाए . शिक्षाकेंद्र उसी में से एक व्यवस्था . हमारा भविष्य का मार्ग यही से गढता है ; बनता है . मनुष्य के दिमाग का 80 प्रतिशत विकास स्कूल जाने के पहले ही हो चुका होता है . फिर प्रश्न उठता है की , हम स्कूल , कॉलेज जाते ही क्यो ? उस का उत्तर है -- उस प्राप्त ज्ञान को संदर्भ , विश्लेषण ,तर्क , परख , तंत्र , अभ्यास से परिष्कृत करने के लिये .
सांप्रत शिक्षा व्यवस्था की परीक्षा में जादातर परीक्षा होती है स्मरणशक्ती की . फिर अंक या श्रेणी द्वारा उसे दर्शाया जाता है . एक ही स्कूल में , एक ही पाठ्यक्रम पढने वाले छात्रों को मिलती है अलग अलग श्रेणी , मिलते है अलग अलग अंक . ऐसा क्यो होता होगा ? प्रकृति ने सब को एकसमान दिमाग दिया है , फिर परिणाम भिन्न - भिन्न क्यो ? इस के कई कारण है..... परिवार , परिवेश , रुची , समय प्रबंधन ( time management ) , आर्थिक - सामाजिक परिस्थिती , स्वास्थ्य , एकाग्रता , अवसर आदि.. और सब से महत्त्वपूर्ण है , ना सपने देखना और ना लक्ष्य तय करना. इस विराट सृष्टी मे हमारा जन्म होना निरुद्देश नही ; बिना वजह नही . इसका निश्चित उद्देश है . बिनावजह मनुष्य जीवन निरर्थक है .
बिना गंतव्य मार्गक्रमण मतलब अथाह समुंदर मे बिना पतवार , बिना दिशादर्शक के नाव से घुमना . .... क्या हासिल होगा ? जब कुछ हासिल ही नही करना है !.........
सब से पहले सपने देखो ... और गंतव्य निश्चित करो . उस गंतव्य प्राप्ति के लिये सार्थक योजना बनाओ . जब गंतव्य ( goal ) निश्चित कर लिया है तो उस के लिये बनायी गयी योजना ( plan ) पर पुरी शिद्दत से , ईमानदारी से , मेहनत से कार्य करो . इस से सभी मुश्किलों के हल भी अपने आप सामने आयेंगे .
आज तक यशप्राप्ती का रामबाण शॉर्ट कट या सफलता की रेडिमेड कुंजी नही खोजी गयी है . लेकिन अपने गंतव्य पर पहुंचने वाले व्यक्ति देखे है सभी ने .
बडे सपने साकार करने के लिये छोटी छोटी खुशीयों की कुर्बानी दो . याद रखो , ' No gain without pain ' .कितनी भी मुश्किलें आये राह में , उन का डटकर मुकाबला करो....
लहरों से डर कर नौका पार नहीं होती
कोशिश करने वालों की हार नही होती...
आपके मन में उभरते सवाल :
* लोग क्या कहेंगे ? ----- कम अंक मिले तो लोग क्या कहेंगे ?...
' कुछ तो लोग कहेंगे , लोगों का काम है कहना......'
आपको प्राप्त अंक , आपके व्यक्तित्व का मूल्यांकन नही है . अपेक्षित अंक प्राप्त होना , आप के गंतव्य तक जाने का रास्ता सुलभ जरुर कर सकते , लेकिन वह अंतिम पर्याय नही है . हमारे दिमाग की क्षमता इतनी अकल्पनीय है की उसे गंतव्य ( goal ) दिया तो वह किसी भी चक्रव्यूह से रास्ता खोज ही लेता है . केवल अपने ध्येय , योजना , मार्गक्रमण और खुद से इमानदार रहना जरुरी है . आत्मविश्वास जरुरी है . अपने आप को पहचान गये तो , किसी के कहने से क्या होता है ! नजर अंदाज करीये और दृढता के साथ , संकल्प के साथ मार्गक्रमण करते रहीये .
* अब क्या होगा , कैसे होगा ? ----+ विश्वास रखीये , ध्येयप्राप्ति निश्चित होगी .क्यों की आपने ईमानदारी से , संकल्प के साथ मेहनत की है . रुकावटे आ सकती है ; हार नही !
रुक जाना नही कही तू हार के...
काॅंटो पे चल के मिलेंगे साए बहार के..
सकारात्मक रहे... आपत्ति में इष्टापत्ती खोजीए . सुअवसर परखीये , उस का फायदा उठाइये और ध्येयप्राप्ती के लिये चलते रहीये.
* असफल हुये .. अब क्या ?--- इतना सब कुछ करने के बाद भी निर्धारित गंतव्य तक नही पहुंच पाये तो क्या हुआ ? .... गंतव्य के अगल- बगल कही न कही तो पहुंचे . इसे असफलता नही कहते ..... नये क्षितीज खोजना कहते है ! कोलंबस हिंदूस्थान खोजने निकल पडा अनजाने पश्चिम के नये रास्ते..... नये तर्क के साथ... पहुंचा कॅरेबियन टापूओं पर ..... वेस्ट इंडिज और दक्षिण अमेरिका के तट पर ! क्या कोलंबस असफल हुआ ? बिलकुल नही... निर्धारित लक्ष्य की ओर मेहनत , लगन से मार्गक्रमण करने वाला कभी असफल नही होता . ..... खोजता है वह नई दुनिया !.... स्थापित करता है वह सफलता के मापदंड.... नये क्षितीज पर ! जो रुकता है वह असफल होता है .... मार्गक्रमण करने वाला नही !
* मुझे उस से कम अंक क्यो ? ----- आप तुलना क्यो करते हो ..... पुरे संसार में आप एकमेवाद्वितीय ( unique ) हो . आप मे वो खुबीयां है , वह क्षमता है , जो दुसरों में नहीं . और हर एक की स्वतंत्र क्षमता होती है , विशेषता होती है . जो अपनी क्षमता की सीमायें लांघते है , उन्हे हम पूजनिय मानते है . अपनी क्षमता को भलीभाॅंती जानकर अपनी विशिष्टता में निपुणता लाओ. अंक आपके विशाल व्यक्तिमत्व का बहूत छोटा सा पहलू उजागर करते है . जीवन की सफलता आपके संपूर्ण विकसित व्यक्तिमत्व पर निर्भर है , अंको पर नही ......
विजयपथ = सपना ---> संकल्प ----> ध्येय निर्धारण ----> योजना ---> पूर्ण क्षमता से मार्गक्रमण ---> बाधा , अनपेक्षित मार्ग बदलाव ----> नयी संभावनाए , अवसर का लाभ , सकारात्मकता ---> ध्येय (goal)
लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर . 7066911969
👌👍💐
ReplyDeleteसुंदर लेख ,आपको नमन
धन्यवाद मनोज गोरे जी....
Deleteधन्यवाद मनोज जी
Deleteप्रबोधनपर लेख
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