Thursday, July 16, 2020

भोयरी संस्कृति - १३ : सिरी गनेस चतुरथी

भोयरी संस्कृति - १३ : सिरी गनेस चतुरथी

श्री गणेशाय नमः । ॐ गणपतये नमः ।

भोयरी संस्कृति मऽ भादवा  मह्यनाकऽ  चांदनी चउथ ला सिरी गनेस चतुरथी ला पार्थिव गनपति पूंजा होस . येको स्वरूप घरगुती बी सऽ आनऽ सार्वजनिक बी सऽ . 
भोयरी संस्कृति मऽ दस दिन को सिरी गनेस चतुरथी को पर्व / उत्सव इतिहास कऽ हिसाबकन् नवो सऽ . गनेस पूंजा मातर पुरानोच रिवाज सऽ . 
* घर बांधे त् दरुजा कऽ चवकट की वरतऽ की पाटी - ' गनेस पट्टी ' .
भीर खांदी त् वोकऽ जवर दगड ला सेंदूर लगायो - गनेस .
* पूंजा मांडी त् बिडा कऽ पान पर मांडी सुपारी - गनेस .
भोयरी संस्कृति मऽ गनेस ला आकार - उकार आन् माध्यम की भरमार ! दगुड , लकडी , मुरी , रंग , माती , धातू , फुल असो कोनतोच माध्यम वरजिक नहाय ... कोनतो बी माध्यम चलस . कोनती बी पूंजा रव्हन देव .... पह्यलो मान सिरी गनेस को ! भोयरी संस्कृति मऽ गनेस को स्थान असो अद्भूत ! 

१ . इतिहास आन् मान्यता :  
वक्रतुंड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ । 
निर्विघ्नं कुरुमे देव सर्वकार्येषु सर्वदा ।।
*  गनेस महादेव - पारबती को पोरग्यो होय . डिंक नाव को उंदरो गनेस जी को वाहन .
* ज्योतिस मऽ गनेस जी ला केतु ( छाया ग्रह ) को देवता मानस .
* हत्ती को मुंडो तेकन - गजानन .
* गनपति आदिदेव सऽ , जिन नऽ हर जुग मऽ अवतार लेयो . सिवमानस पूंजा मऽ सिरी गनेस ला प्रणव ( ॐ ) कह्येस . येनऽ येकाकस्यर बरमा ( ब्रम्ह ) मऽ वरतऽ को भाग गनेस मस्तक , खलतऽ को पेट , चंदर बिन्दू मोदक ( लाडू ) आन् मातरा सोंड सऽ . 
* गनपति को मतलब सबन दिस्या को स्वामी .
* रुगवेद मऽ गनपति स्यबद आयेस . यजुरवेद मऽ बी उल्लेख सऽ .
* येक मान्यता कऽ अनुसार गनेस आर्येतर देवता सऽ . येनऽ ग्रामदेवता ला रगत को अभिसेक होत होतो , तेकन सेंदूर लगावनो वोको प्रतिक सऽ .
* पुरान मऽ गनपति को नाव गनेस सऽ . पुरान कऽ अनुसार गनेस जी नऽ आठ अवतार लेयास . 
१ - वक्रतुंड : वक्रतुंड रूप मऽ गनेसजी नऽ मत्सरासुर आन् वोका दुय पोटुना ( सुंदरप्रिय आन् विस्ययप्रिय ) को संगार करे .
२ - येकदंत : महरसी च्यवन को पोरग्यो आन् सुक्राचार्य को चेलो ' मदासुर ' को संगार करन साठी गनेसजी नऽ येकदंत रूप धऱ्यो .
३ - महोदर : मोहासुर पासिन देवता कऽ मुक्ती साठी गनेसजी नऽ महोदर अवतार लेयो .
४ - विकट : जलंधर आन् वृंदा को पोरग्यो  ' कामासुर ' कऽ संगार साठी गनेसजी नऽ मोर कऽ वाहन पर को ' विकट ' अवतार लेयो .
५ - गजानन : गनेसजी नऽ कुबेर को पोरग्यो  ' लोभासुर ' ला हारवन साठी गजानन को रूप धऱ्यो .
६ - लंबोदर : क्रोधासुर कऽ संगार साठी गनेसजी नऽ लंबोदर रूप धरकन् वोला हराये .
७ - विघ्नराज : गनेसजी नऽ विघ्नेस्वर को अवतार लेकन ममतासुर को मान मर्दन करे .
८ - धूम्रवर्न : अहंतासुर कऽ संगार साठी गनेसजी नऽ धूम्रवर्न को अवतार लियो . 

पह्यलऽ पूंजा कऽ मान को अनादि गनेसजी की पूंजा दुनियाभर मऽ पाच हजार सालपासिन होय रह्यीस . इरान , अफगानिस्तान , इंडोनेसिया , बरमा , थायलंड , चिन , जपान , सिंधू घाटी सभ्यता , माया संस्कृती मऽ गनेस पूंजा का परमान सऽ . 
* गनेसजी ला तमिल मऽ विनयागार / पिल्लै , तेलुगू मऽ विनायाकुडू , बरमा मऽ पाली महा विनायक , थायल्यांड मऽ फरा फिकानेत , जपान मऽ कांगीतेन कोस . 
* गनेसजी की सार्वजनिक पूंजा को पर्व छत्रपति सिवाजी महाराज कऽ राज मऽ सुरू भये . मराठी राज खतम होन कऽ बाद सार्वजनिक पूंजा बी थांब गयी . इ . सं .  १८९३ मऽ लोकमान्य तिलक जी नऽ येला वापिस सार्वजनिक पूंजा कऽ रूप मऽ आघऽ लाये . गनपति विसरजन की रसम बी वून नऽ चालू करी .
गनपति बाप्पा मोरया ऽ ऽ ऽ ऽ..................
* येमऽ कऽ मोरया नाव को भी इतिहास सऽ . ' मोरया गुसाई ' चवदावऽ सदी म को गानपत्य संप्रदाय का मोठो संत होतो . उन को जलमगाव मोरगाव . गनपति को महाभगत .. अस्टविनायक की यात्रा वून नच चालू करीस . वून नऽ चिंचवड ( पूना , महाराष्ट्र ) ला संजीवन समाधी लेइस . महा भक्ती कऽ कारन वून को नाव गनपति कऽ नाव संग जुड्यो . 
* गनपति की आरती समर्थ रामदास स्वामी नऽ लिखीस ... :
सुखकर्ता दुःखहर्ता वार्ता विघ्नाची ।
नुरवी पुरवी प्रेम कृपा जयाची ।
सर्वांगी सुंदर उटी शेंदुराची ।
कंठी झळके माळ मुक्ताफळांची ।
जय देव जय देव जय मंगलमूर्ती......

* सूरदास जी की हिंदी आरती..:
जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा
माता जा की पार्वती , पिता महादेवा....

२ . दूब ( हराळी ) की मान्यता :  पुरान कऽ अनुसार अनलासुर नाव कऽ दयीत नऽ रिसी - मुनी - मानुसना ला जिता यी गिटकनो चालू कऱ्यो . सबन ला बचावन साठी गनेसजी नऽ अनलासुरला च गिटक्यो . उनकऽ पेट मझार जलन होनला लागी . तबऽ कस्यप रुसी नऽ २१ दूब ( दूर्वा ) गनेसजी ला खान साठी दी . वोकन उनला आराम भयो . तेकन गनेसजी ला २१ दूर्वा चढावस . 
३ . मोदक : पदमपुरान कऽ अनुसार गनेसजी ला मोदक भायीच आवडस . मोदक को मतलब होस , खुसी देनी वालो . मोदक ला स्यास्तर मऽ ग्यान को प्रतिक मानस . 
* येक डाव रिसी अतरी आन् वून की लाडी अनुसूया नऽ महादेव - पारबती आन् गनेसजी ला जेवन साठी आवतन देयो . गनेसजी ला खूब जोर की भूक लागीती . गनेसजी की थाटी पह्यले लगायी . गनेसजी जेवत रह्या..... अनुसूया रांधतच रही ... वा रांधता रांधता थक गयी पर गनेसजी को पेटच नही भरे . तब अनुसूया नऽ आखरी उपाव मऽ मोदक वाहाडे . मोदक खायकन् गनेसजी खुस भया आन् जोर की डकार मारी . इ देखकन् भोल्यानाथ को बी पेट भर गयो . आन् येक नही तर २१ डाव डकार मारी . 
४ . रिवाज : घर मऽ आन् सार्वजनिक जागा पर गनपति मांडस . साजरी सजावट करस . कोनी नवस को गनपति बसाडस . सकार - झालपड्या दुय बेरा आरती - पूंजापाती करस आन् परसाद बाटस . घर कऽ गनपति को रोज कोनी न् कोनी कऽ घर जेवन को परसाद रव्हस . सार्वजनिक गनपति को आखरी दिन महापरसाद करस . सार्वजनिक गनपति को डेकोरेसन बी खूब मोठो , खूब लायटींग वालो , जत्रासरखो रव्हस. धा दिन पूंजापाती , आरती. भजन कन् घर , येटार , गाव सरग ( स्वर्ग ) सरखो लागस . सारो दम् दम्.......  घर मऽ बसाडस वा गनेसमूरती नानी रव्हस पर सार्वजनिक गनेसमूरती मोठमोठाली रव्हस . गनपति मऽ गनगोत , सेजारी पाजारी , सोबतीना की भेटभलाई होस . पोटुबाटुना , मोठा मानुसना , बाईलोगना इ सारा धा दिन भक्तिभाव , खुसी कऽ गंगा मऽ नहाय लेस . घर - गाव को वातावरन सुध्द , मंगल होय जास . जेक्यान गनपति नही बी बस्यो वूई भी रोज नाना परकार को परसाद बनायकन् गनपति ला भोग लगावस . सारऽ कितऽ येकच आवाज .....
गनपति बाप्पा मोरया
मंगलमुर्ती मोरया......

५ . अनंत चतुरदसी : महर्सी वेद व्यासजी नऽ महाभारत की रचना करीस . पर लिखन को काम गनेसजी नऽ करेस . रात - दिन लिखकन् गनेसजी थक जातो , वोकन उन ला आसुक नही आया पाह्यजेन ,  वोकऽ साठी  वेद व्यासजी नऽ गनेस चतुरथी कऽ दिन वून ला माती को लेप लगाये . लेप सुख्याकन् गनेसजी को आंग अकड गये . महाभारत लिखन को काम दस दिन चाल्यो . चतुरदसी ला लिखन को काम खतम भये  . पर लेप सुक्यो तेकन गनेसजी ला आसुक आयेच आये . गनेसजी को आंग ठंढो करन साठी वेद व्यासजी नऽ उन ला तलाव कऽ पानी मऽ बसाडे . गनेसजी ला दस दिन बेगबेगरा पकवान , फल को भोग लगाये . तेकन आपन गनेसजी की माती की मूरती सिरी गनेस चतुरथी ला बसाडकन् दस दिन बाद अनंत चतुरदसी ला मूरती को विसरजन करजे . 
पुरानऽ जमाना मऽ गीली - पिसी हरद की नानी सी गनपति की मूरती बनावत होता . वोकी दस दिन पूंजापाती करकन् बाद मऽ पानी मऽ सिराय देता . वोनऽ पानी ला झाड कऽ बुडसिन डाय देत होता . 
येला मोठो रूप देये लोकमान्य तिलकजी नऽ .
गनपति बाप्पा मोरया
आगलऽ बरस तू जल्दी आ ....
येक लाडू फुट्यो , गनपति बाप्पा उठ्यो.....
येक दुय तीन चार , गनपतिजी की जयजयकार......

लेखक :  सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर . 

17 comments:

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    1. जय राजा भोज.... धन्यवाद

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    1. आगलऽ बरस तू जल्दी आ...
      धन्यवाद...

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    1. ॐ गणपतेय नमः...
      धन्यवाद

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  4. खुब चांगलो लिखान,मा सरोसती आन गणपती की कृपा सं

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    1. धन्यवाद मनोज जी.. माय सरोसती नऽ च दान करीस भोयराऊ बोली....
      गं गणपतेय नमः....

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    2. जय राजाभोज , जय मायबोली भोयरी

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  5. स्यब्दनाच नाय, गजब को लिखेस ....

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    1. धन्यवाद भाऊ...
      कमेंट खलतऽ नाव लिखता त् मला नाव ठाव पडतो... धन्यवाद

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  6. मायबोली भोयरी साहित्य मंच कं संस्थापक सुरेशभाऊ क लेखनी ला नमन

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    1. धन्यवाद मनोज जी....
      सबन को सहयोग आन् मेहनत सऽ...

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  7. *जय गणेश देवा*

    रिद्धि सिद्धि के दाता, विघ्नहर्ता सुखदाता आपके और आपके परिवार में सुख समृद्धि के आगमन का आशीर्वाद प्रदान करें।

    *कोविड टीका, स्वयं , परिवार ,परिचितों को लगवाए*
    धन्यवाद
    🙏🏻जय गणेश देवा🙏🏻

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    1. धन्यवाद नन्दलाल जी 🙏🙏🚩

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  8. आदरणीय देशमुख जी कृपया भोयराउ / पवारी भाषा की व्यकरण ,शब्दावली का PDF भेजें ।धन्यवाद

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  9. मेरे whatsapp no.9131113658 पर भेजे ।

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