फायदा को कायदो - भाग १
Bhoyar culture _ भोयर संस्कृति
Bhoyari dialect _ भोयरी बोली
धंदो पानी , बेपार , सेवा , चाकरी यको गनित ' फायदा - नफा ' क मंतर बिगर पुरो नी होत . पर कई लोगना ला ' नफो - फायदो ' ( दुसरा को ) इ पाप सरिखो वाटस . आपन न कमाया पायजेन पर दुसरा न आपलो काम बेगार प कऱ्या पायजेन , असी बी सोच कुचित परमान म दिसस .
परमार्थ ला उच्ची जागा स , पर मह्यनत कन् कमाये फायदा ला मोह माया क पंगत म बसाडस .
कोनतऽ न कोनतऽ स्वार्थ , मतलब कन , प्रेमभाव कन , नातागोता कन येक मानुस दुसरऽ मानुस सिन जुडस , येमऽ का गलत स ?
' जहान अति वहान माती ' या कहावत हरेक गोस्ट ला लागू होस , मंग वा चांगली रहो क वांगली !
दुसरा को कोनतो बी नुकसान कऱ्या बिगर जी नफो - फायदो कोनी कमावस , वोमऽ गलत का स ?
येक गोस्ट सांगूस ....कोनऽ टाईम पहाड क पायथा जवर येक नानोसो गाव होतो . वहान क लोगना ला आठ घंटा काम कऱ्या बास्त येक दिन क खान लाईक अनाज की मजूरी भेटत होती . गाव क लोगना ला पानी ल्यावन साठी पहाड क सांदी म की येक जागा प जान लागत होतो . वहान नानोसो तलाव सरखो होतो . हरेक मानुस को अरधो घंटो पानी साठी खरच होत होतो . वहान क गुनवंता येनऽ गुनी पोरग्या न यको गनित मांड्यो . १६ लोगना को पानी साठी अरधो घंटो मनजे पुरी येक दिन की हजरी बनत होती .
गुनवंता न पानी क जागा पासिन गाव पावतर क जागा ला साजरो देख्यो . पानी पासिन गाव पावतर सुलूप होतो . वोकऽ डोकसा म भन्नाट आयडिया आई . जर पानी क जागा परिन गाव पावतर पानी ल्यावन को जुगाड करे त , गाववालाना को रोज अरधो घंटो बाचेन आन् वोमिन फायदा को गनित बी बसेन !
दुसरऽ दिन गुनवंतो काम प नी गयो . आपलो पावडो , टिकास , घमिलो लेकन वू पानी वालऽ जागा प गयो . गाव कित की पार ला वू खंदन ला लाग्यो . वहान वरतऽ वरतऽ च माती होती , खलतऽ मुरूम अन् पास्यान होतो . पह्यलऽ दिन गुनवंता न वरतऽ क माती म ३०/४० फुट की नाली खांदी . दुसरऽ दिन वोला काम पर जानो भाग होतो . आज को त निभेत्यो . बिना भाकर को वू काम प गयो . आंग म त जोर नी बाचेतो पर पानी पेय पेय कन् पुरो दिन काम कऱ्यो . रात म बी गुनवंतो उलिसो खाय कन् सोयो . आब वोक जवर येक दिन को अनाज होतो . भुको रवकन् काम करनो तकलीफ वालो होतो . आज वोन दिनभर नाली खंदी . येकडाव च जेये . दुसरऽ दिन पासिन अरधो दिन मजूरी आन् अरधऽ दिन नाली खंदत रह्यो . मंझार म वोनऽ कई उपास कऱ्या आन् अनाज बाचाडे . वोनऽ अनाज ला खाती ला देकन छिन्नी अन् घन खरिद्यो .
गाव का लोगना वोला हासत होता . गुनवंता क डोकसा म फरक पड्यो , असो लोगना ला वाटे . पर गुनवंतो आपल च धुन म होतो . साल भर गुनवंता न असोच काम कऱ्यो . तलाव कित दुय जागा प नानी खाई होती . गुनवंता न जंगल मिन ठोकर ठोकर बास तोडकन् ल्याया . गरम सराक कन् बास ला पोकर कऱ्यो . असा वोनऽ बास का पाईप बनाया .
दुसरऽ साल वोनऽ खाई म बास को मच्यांग बनायकन् वोपरिन बास का पाईप सेलमेल डाया . गाव पावतर ज्यान वोन नाली खंदीती , वहान वू मोठो भीर सरखो गड्डो खंदन ला लाग्यो . लोगना न समजे क गुनवंता म्याहाड भयो . गुनवंतो भुको तिसो आपलऽ काम म मगन होतो . साल भर म गुनवंता न गड्डो खांद्यो . दुय बरस अरधो पेट जेय कन् , मजूरी , खंती को काम कर कर कन् वू रोड भयो . वोक आंग की हड्डीना च दिसत होती . कई डाव काम करता करता वोला चक्कर आवत होतो . पर गुनवंतो आपलऽ बानी पर अड्यो रह्यो .
आब वोन तलाव आन् नाली क मंझार खंदन ला सुरवात करी . जसी पानी की टोंडी फुटी वूसो पानी गुनवंता क नाली मिन , बास क पाईप मिन गाव जवर क मोठऽ गड्डा म जमा होन ला लाग्यो . गुनवंता ला भगिरथ सरखो हरीक भयो .
तीन साल क मह्यनत ला ... कस्ट ला सफलता को झरो फुट्योतो .
गुनवंता न गड्डा जवर च आपली झोपडी बांधी आन् गड्डा ला कुप भऱ्यो .
गुनवंता न गाववालाना ला कह्ये क तुमाला पानी भरन को होयेन त १५ मिनिट क रोजी को अनाज देनो पडेन . गाववाला राजीखुसी तयार भया . वून को बी १५ मिनिट को फायदो होतो अन् पयदल वोतरऽ दूर जान की तकलीफ बी बाचीती .
आब गुनवंता ला मजूरी प जान की जरूरत नयीती . घर म रव कन् च वोला येक दिन म तीन दिन क मजूरी को अनाज भेटन ला लागेतो .... ( क्रमशः )
लेखक : इंजि . सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर
खूब साजरी रचना
ReplyDeleteधन्यवाद जी 🙏
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