Tuesday, January 10, 2023

निर्माण _ भाग - २०. Hindi language _ हिंदी भाषा

निर्माण _ भाग २०
Hindi language _ हिंदी भाषा

रिश्तें _ बनते - बिगड़ते ! 
नयी साइट , नया खेल ! हर साइट का मिजाज भिन्न भिन्न और अकल्पनीय भी ! 
हमें जो नयी साइट मिली , वह था एक खेत . सरकारी विभाग और भूसंपादन का रिश्ता सास - बहू का . ( तीव्रता के अनुसार सांप नेवले का ..) भूसंपादन यह क्लिष्ट, न सुलझने वाली अंतहीन प्रक्रिया है.. इस प्रक्रिया में मध्यस्थ राजस्व विभाग .. हर सरकारी विभाग का प्राधान्य क्रम और तौर तरीके अजब गजब .. भूमि संपादन होती है कृषक की ... पहले से ही मुसीबतों का मारा किसान इस प्रक्रिया में अपने संतानों के उज्ज्वल भविष्य के सपनें और खुशहाली की उम्मीद देखता है.. लेकीन जब मुआवजा बंटता है , तो सबका अपेक्षाभंग होता है.. और इस प्रक्रिया में अब शामिल होता है न्यायव्यवस्था का विभाग ! 
जिस विभाग को ज़मीन की जरूरत है , वह मुआवजे की रकम राजस्व विभाग को सौंप कर जल्द ही कार्य प्रारंभ करना चाहता है.. किसान मुआवजे की रकम और कुछ शर्तों को ले कर संतुष्ट नही.. न्यायालयीन प्रक्रिया की अपनी मजबूरी.. 
नतीजा , प्रोजेक्ट में विलंब , किसानों का संगठित आक्रोश और हम टेंडर हाथ में पकडे ' त्रिशंकू '. 
जब हम साइट पर पहुंचे.. वहॉं खेत .. किसान अपनें अपनें खेतों में काम कर रहे थे . मैने विभाग के इंजिनिअर की ओर प्रश्नार्थक निगाह से देखा . उन्होंने प्यारी सी मुस्कान लिए मुझे समझाने की कोशिश की . ' अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों..' की तर्ज पर वे राग अलापने लगे . साथ मे , ' हम है ना ! ' की अदृश्य साथ .. हमारा माथे पर हाथ ! 
कार्यालय जा कर मैनेजर से चर्चा की.. वहॉं भी ऐसे ही हालात . चेहरे पर मजबूरी की अजीब सी हंसी.. जिव्हा पर चाशनी . हमारी हालत बलि के बकरे जैसी . इधर कुआं उधर खाई ! अब किधर जाना भाई !!!
' हे भगवान , एक तो भी साइट का शुभारंभ बिना झंझट से करा दो..' लेकीन हमारी सुनेगा कौन ? कर्म के साथ साथ तनाव ही हमारी पूजा.. अपनी अकड और खाना पचाने का सुलभ सरल मार्ग ! 
शुरूआत ऐसी हुई है.. आगे आगे देखो होता है क्या ! 
एक साइट का काम समाप्त होने की कगार पर था .. वही का मटेरियल और स्टाफ इस साइट पर लाने की योजना बनाई . 
साइट मटेरियल से लदा बडा ट्रक निकला . साइट जिस गांव के क्षेत्र में थी , उस गांव के रास्ते से ट्रक को मोडा . गांव तक ट्रक पहुंचा . अब गांव पार कर के साइट पर पहुंचना था . असली दिक्कत यही थी . गांव के छोटे और टेढ़े मेढ़े गलियों से ट्रक कैसे ले जाए ? _ यही मुख्य समस्या थी . सुपरवाइझर ट्रक के आगे पैदल चल रहा था.. मै किसी अनजानी समस्या की कल्पना कर चिंता में था . गली के दोनों बाजू में पानी की संकरी नाली . अगर ट्रक का पहिया नाली में गया तो काम तमाम ! ड्रायव्हर अपनी कुशलता से एक एक इंच ट्रक को आगे बढा रहा था . रास्तें पर गांव के लोगों की भीड इकट्ठा हो गयी . यह काम अब तमाशे में तबदिल हुआ था . घर की कवेलू की छतें ट्रक को छू रही थी . मेरे पसीने छूट गये . कई जगह भारी भरकम ट्रक की वजह से किनारे की नालियां टूट रही थी . मै सामान्य रहने की कोशिश कर रहा था . उछल कूद करते हुए गांव का काफी हिस्सा पार हो गया था.. आगे एक दो मंजिले पुराने मकान की छत कुछ ज्यादा ही बाहर निकली थी . और वही पर ट्रक जरासा उसी मकान की ओर झुका .... बस्स , जो नही होना चाहिए था , वही हुआ . ट्रक मकान की उस छत को घसीटने लगा . लोग चिल्लाने लगे . ड्रायव्हर घबरा गया . ट्रक को रिव्हर्स लेने पर वह और झुक रहा था . ना पीछे जा सकते थे , और ना ही आगे ! छत का कुछ हिस्सा टूटना तय था . अगर ट्रक ज्यादा समय तक यहॉं रुका तो , गांव वालों का गुस्सा ट्रक और ड्रायव्हर पे उतर सकता था . 
मैने ड्रायव्हर को ट्रक आगे लेने के लिए कहा . जो भी होगा , देखा जाएगा ... टूटे छत का मुआवजा दे देंगे , ऐसा मैने मन ही मन सोच लिया था . ट्रक धीरे धीरे आगे बढा.. और .....
( क्रमशः ) 

लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर

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